May 17, 2023   gpsahu



अंधविश्वास और वैज्ञानिक युग - मेघ राज मित्र

बिना किसी प्रमाण के किसी भी बात पर विश्वास करना ही अंधविश्वास कहलाता है। अंधविश्वास कम या अधिक रूप में दुनिया के प्रत्येक राज्य में प्रचलित है, परंतु हमारे भारतीय लोगों में अंधविश्वास बहुत ज्यादा है। प्राचीन मानव वैज्ञानिक खोजों की कमी के कारण प्रत्येक बात के घटित होने का कारण नहीं जानता था। वह सूर्य ग्रहण, चंद्र ग्रहण, धूम्रकेतू तथा इंद्र धनुष के विषय में कुछ नहीं जानता था। इसीलिए उसने ग्रहणों के समय होने वाली अच्छी बुरी बातों को और शुभ होने के अंधविश्वास से जोड़ लिया। इसी तरह दूसरे अंधविश्वास प्राचीन मानव ने ही पैदा किए तथा यह जन्म-जन्मांतर तक चलते हुए आज भी हमारे मध्य प्रचलित हैं। प्रत्येक देश, धर्म में अंधविश्वास भिन्न-भिन्न होते हैं। युरोपीय देशों में तेरह नंबर को अशुभ माना जाता हैं, हिंदू बुधवार, मुसलमान शुक्रवार तथा यहूदी रविवार को शुभ मानते हैं।

अलग-अलग धर्म भी अंधविश्वास बढ़ाने में सहायक होते हैं। धार्मिक पुस्तकों में दिखाई गई बड़ी से बड़ी गप्प को भी सत्य माना जाता है। किसी पुस्तक में लिखा होता है, कि 'ख्वाजा मूईनुद्दीन चिशती' दीवार पर चढ़ कर बोले, 'चल', तो दीवार चलने लगी। कमाल खां हाथी पर बैठ कर कुए में लीन हो गए और कुंऐ के भीतर ही आराम का जीवन व्यतीत करने लगे। ऋषि समुद्र को पी गए तथा जब देखा कि समुद्री जानवर मरने लगे तो पेशाब कर दिया। तब से समुद्र का पानी खारा होने लगा। ऐसा सभी लोग विश्वास करने लगे। कोई एक शताब्दी पहले यह विश्वास प्रचलित था कि यदि उल्लू की आंख में तेल डाल कर उसका काजल बनाक मनुष्य अपनी आंख में डाल ले, तो उस आदमी को जमीन गढ़ा धन दिखाई देने लगता है। आज कल भी भारत में बहुत से भ्रम प्रचलित हैं जैसे छींकना या बिल्ली द्वारा रास्ता काट जाना या कुत्ते द्वारा अपने कान हिलाना सफर को जाते समय खतरना समझे जाते हैं। अंगूठियों में नग डलवाने से बुरे ग्रहों से बचाव हो सकता हैं, परंतु क्या इन बातों के पीछे कोई भी वैज्ञानिक तर्क है?

कुछ लोग समझते हैं कि भ्रम या वहम केवल अनपढ़ लोग ही करते हैं, परंतु नहीं हमारे देश की विद्या प्रणाली में भी बड़ी मात्रा में अवैज्ञानिक धारणा होने के कारण इन भ्रमों का शिकार पढ़े-लिखे लोग भी होते हैं। हमारे बहुत से डाक्टर भी रोगी के स्वास्थ्य हेतु दवा के साथ साथ दुआ करने को कहते हैं। तथा यदि कोई एम.बी.बी.एस. डाक्टर दवा लेने आए रोगी को सवा सेर नमक दान करने के लिए कह दे तो इसमें हैरान होने की कोई बात नहीं है। हमारे देश के बड़े-बड़े नेता जिन में प्रधान मंत्री, राष्ट्रपति और दूसरे केंद्रीय मंत्री शामिल हैं, ये सब नामांकन पत्र दाखिल करवाते समय कोई शुभ मुहूर्त निकलवाते हैं। बेशक यह पाखंड रचने का कारण लोगों को केवल अंधविश्वास में डालना ही है। यदि कर्नाटक का सीवरेज बोर्ड वर्षा हेतु किसी ज्योतिषी की सेवाएं ले ले तो इसका कारण वर्षा करवाना नहीं बल्कि यह एक राजनीति की चाल है। जिससे वह राजपाट पर कब्जा और राजगद्दी का समय बढ़ाना चाहते हैं। हमारे देश में पाए जाने वाले अंधविश्वास नुकसानदाय है। क्योंकि यह हमारे राष्ट्र को अवनती की ओर ले जाते हैं लोगों की तर्क शक्ति को कमजोर करते हैं। परिश्रमी लोग भी अपनी भूख या गरीबी का कारण अपने कर्मों से जोड़ लेते हैं। गरीबी और भूख के कारण को ढूंढ कर उन्हें दूर नहीं कर सकते। इस तरह से समस्याएं हल नही करते, बल्कि इनके आगे हथियार फेंक देते हैं। इस तरह परिश्रमी लोगों में ऐसी धारणा पैदा हो जाती है। जो राष्ट्र के लिये नुक्सानदायक है।

हमारे देश के तर्कशील लोगों का यह कर्त्तव्य बनता है कि वह इन भ्रमों के विरूद्ध लड़ाई के लिए मैदान में उतरें और वैज्ञानिक सत्य की तलवारों से अंधविश्वास की जंगाल लगी जंजीरें तोड़ डालें। भविष्य में इन अंधविश्वासों के अंत के साथ मानव जाति की बहुत सी समस्याओं का अंत हो जाएगा।

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