सद्गुरु कबीर की एक साखी है !
कबीर जब हम पैदा हुए जग हंसे हम रोय।
ऐसी करनी कर चलो हम हंसे जग रोय ।।
जन्म लेते ही हम रोने लगे यह प्राकृतिक नियति है लेकिन जीवन भर रोता रहे यह तो नियति नहीं है। जो व्यक्ति हमेशा दुखी रहता है रोता रहता है वह मानव जीवन को वरदान के जगह अभिशाप बना लेता है । हम दुख को सहकर हंसना सीख सकते हैं सज्जनों!
मुस्कुराना ही जिंदगी है !
हम हंसते हुए संसार से कब विदा होंगे? जब हम जीवन में हंसना मुस्कुराना सीखेंगे।
और मुस्कुराना तब आएगा जब जीवन में प्रत्येक कर्म बड़ी सावधानी और स जगता पूर्वक करेंगे।
कोई जीवन भर रोता रहा शिकायत और दुख भरा जीवन जिया तो वह अंत में कैसे हंस पायेगा।
कहा जाता है कि भगवान हमेशा तथास्तु ! शब्द का उच्चारण करते हैं! दुख और रोना मांगो तो तथास्तु ! और यदि सुख मांगते हो तो भी तथास्तु !
यह आप पर निर्भर है कि आप क्या मांगते हो और क्या चाहते हो।
संसार में अधिकतम लोग दुख ही मांगते हैं - कारण ! उनके सोच विचार वाणी और कर्म दुख को ही आकर्षित करती है इसलिए सद्गुरु कबीर को कहना पड़ा -
तन धरि सुखिया काहु न देखा ।
जो देखा सो दुखिया ।
सज्जनों ! कहीं भगवान और शैतान ऊपर नहीं बैठा है जो तुम्हें सुख और दुख देता हो। अपने कर्मों के परिणाम ही सुख और दुख देता है।
इस पर गोस्वामी जी ने अपने मानस में लिखा:
कोई नहीं सुख दुख कर दाता ।
निज कृत कर्म भोग सुन भ्राता ।।
सज्जनों ! अपने आप का दोस्त और दुश्मन सिर्फ हम ही हैं आप ही अपने सुख दुख के करता है। दूसरे की बात व्यवहार से प्रभावित होकर आप स्वयं दुखी होते हैं यदि आप चाहो तो दुखी होने से बच सकते हो।
अंत में सार बात यह है कि
जन्म के समय रोना मजबूरी है लेकिन जीवन भर रोना बेवकूफी है। इसलिए सच्चे संत सद्गुरु एवं सच्चे साहित्य के सानिध्य पाकर हम अपने जीवन में समझ पैदा कर सकते हैं विवेक जागृत कर सकते हैं तो जीवन में कैसी भी परिस्थिति आए हम हंस सकते हैं ।... सादर साहेब बन्दगी !
Ghanshyam Prasad Sahu
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