दक्छिन कोसल म महानंदी के परताप ले पदमावतीपुरी म धन-धान अकबकात ले होवय । धान-गहूॅं, दलहन-तिलहन सब । किसान बइला ल नंदी जाने अउ भगवान संकर के भक्ति करे । सिवलिंग के कल्पना करके लकड़ी के तेलपेरई मसीन (घानी या कोल्हू) बनइन । वो मसीन भगवान संकर के नंदी सरूप् बइला दुआरा सुग्घर ढंग से चले लागिस । एखर से तेल जादा निकले । पदमावतीपुरी म तिलहन किसानमन के बड़े-बड़े तेलघानी उद्दोग बनगे ।
उही समे म धरमदेव नाव के एक बड़े तैलिक बैपारी रिहिस । ओखर जीवनसंगनी के नाव सांतिदेवी । दूनो के हिरदे ले भगवान भक्ति के गंगा बोहाय । धरमदेव सिवलिंग रूपी तेलघानी (कोल्हू) चलात भगवान संकर के भक्ति करे । सांति देवी भगवान बिस्नु के भाव-भजन से भक्ति करे । दूनो के जीवन आनंदमय रिहिस । तभो ले, मन म दुख के कॉंटा हबरे कस जनाय । उॅंखर एको संतान नइ रिहिस । उनला भगवान ऊपर अपार सरधा अउ बिस्वास रिहिस । मांघी पुन्नी के सुभ घड़ी म सांतिदेवी के कोरा म एक दिब्य बेटी अइस । ओखर आभा बड़ नियारी । रूप मनोहारी । सुग्घर नैन । मधुर मुस्कान । ओला देख हर कोई बलिहारी हो जाए । रिसि-मुनिमन घलव बेटी गुनगान करत नइ थके । ओला कुलगौरव अउ कीर्ति के असीस देके ओखर नाव रखिन- राजिम ।
खेले के लइक होइस त राजिम जहुॅंरियामन संग खेले । खेल-खेल म वो लइकामन संग गुनी-गियानी कस गोठ करे । संसार के कल्यान अउ भगवत भक्ति के गोठ करे । कभू भगवान के धियान म लीन हो जाए । राजिम के अद्भुत गोठ म लइकामन मगन हो जाए । राजिम अपन दाई-ददा ल देख भगवान संकर अउ भगवान बिस्नु दूनो के भक्ति करे । सिवलिंग के रूप म घानी के अउ भगवान बिस्नु रूप म मूरती के पूजा करे । राजिम के भक्ति म दूनो देंवता के सक्ति देख रिसि-मुनि चकित होगे । ओखर दिब्यभक्ति ल सिरीसंगम नाव दे दिस ।
धरमदेव के एक संगवारी रिहिस- रतनदेव । ओखर घरलछमी के नाव सतबती रिहिस । उॅंखरो तेलघानी उद्दोग रिहिस । एक बेर रतनदेव के बइला बीमार पड़गे । कतको दवई करिस, फेर नइ सुधरिस । रतनदेव संसो म पड़गे । एक दिन धरमदेव, सांतिदेवी अउ बेटी राजिम तीनों रतनदेव के घर गिन । बइला पटियाय राहे । राजिम अपन जोगसक्ति ले जड़ी-बूटी के दवई बतइस । रतनदेव दवई करत थकगे रिहिस । अजमाय अस राजिम के बताए दवई ल खवइस । थोरिक देर म बइला ल चेत आगे । तीन-चार दिन म बइला बने होगे । ये बात पदमावतीपुरी म अउ बाहिर दुरिहा-दुरिहा तक बगरगे । अब तो सकल संसार के दुखियामन नोनी राजिम कर आवय । राजिम सिरीसंगम के भक्ति अउ अपन जोगसक्ति ले दवई-गोंटी देके, रद्दा बताके उॅंखर दुख-पीरा के निवारन करे ।
समय के गाड़ी कतक रइंग जथे । गम नइ मिले । राजिम सगियान होगे । सांतिदेवी-धरमदास ओखर बर-बिहाव के बिचार करे लागिन । रतनदेव के बेटा रिहिस- अमरदेव । अमरदेव सुयोग्य, गुनवान अउ तेल उद्दोग के बड़ा जानकार । सांतिदेवी-धरमदास राजिम संग अमरदेव के रिस्ता के गोठ करे के सोचिन । ये बात ल सुनके रतनदेव अउ सतबती जबर खुस होगे । सबके मन मिलगे त बेरा-बखत म राजिम अउ अमरदेव के बिहाव बने उछाह-मंगल से होगे अउ राजिम अपन ससरार चलेगे ।
जसवती, गुनवती बहु पाके रतनदेव-सतबती अपन भाग ल सॅंहराय लागिन । राजिम के आए ले उॅंखर तेलघानी उद्दोग अउ बाढ़गे । बेरा-बखत म राजिम-अमरदेव के एक बेटा अउ एक बेटी होइस । बेटा के नाम जसराज अउ बेटी के नाव राजप्रिया । अब राजिम के हिरदे ले बेटा-बेटी संग सकल संसार बर ममता के निरमल धार बोहाय लागिस । ओखर छइहॉं म जउने आए ते असीम सांति पाए ।
उही समे म कांकेर म कंड़राराजा के राज रिहिस । राजा-रानी दूनो तीरथ-बरत करे बर निकले रिहिन । जगन्नाथपुरी म भगवान जगन्नाथ के दरसन, पूजन करके लहुटत रीहिन । मारग म उनला भगवान बिस्नु के सॉंवल मूरती मिलिस । मूरती के सुंदरता देख राजा-रानी मोहागे । सैनिकमन मूरती ल डोंगा म चढ़ाके के महानंदी के जलमारग ले ले जात रिहिन । धमतरी के रूदरी तीर हवा के तेज झोंका म डोंगा के डगमगाय ले मूरती नंदी म बुड़गे । सैनिकमन जइसे-तइसे बॉचिन ।
वो घटना के छै महीना, साल भर बाद के बात ए । माता राजिम हर महीना एकादसी उपास राहे। एक बेर, माता राजिम महानंदी म एकादसी अस्नान करे बर गिस त पानी भीतरी पथरा म हपटगे । दूसर माईलोगिन संग पथरा ल पानी ले बाहिर निकालिन । वो करिया पथरा के मनमोहक मूरती राहे । माता राजिम मूरती ल अपलक देखते रहिगे ।
राजिम ! का होगे ? कइसे कुछु नइ बोलत हस, या ?
देखत हॅंव, भगवान के मूरती कतक सुग्घर हे ।
कोन भगवान के मूरती ए ?
लोचन भगवान ।
उही लोचन भगवान जेखर ते भक्ति करथस ।
हव । भगवान मोला एकादसी म दरस दूहूॅं कहे रिहिस । तब ले एकादसी उपास रहिथॅंव ।
आजो एकादसी ए, राजिम । तोर भक्ति सिद्ध होगे, या ।
वो मूरती भगवान बिस्नु के रिहिस । वो मूरती ल घर लाके माता राजिम पूजा कुरिया म आसन दे दिस । वोहा ओखर निसदिन पूजा-पाठ करे । माता राजिम जनकल्यान के जउन कामना करे, वो जरूर पूरा होय । एखर से मूरती के सिद्धि अउ राजिम के परसिद्धि चारों मूड़ा बगरे लागिस । संगे संग सिवलिंग रूपी तेलघानी (कोल्हू) ले कोल्हेस्वर महादेव के भक्ति । ये भॉति माता राजिम ल भगवान लोचन अउ भगवान कोल्हेस्वर महादेव दूनो के असीस मिलिस । रिसी-मुनिमन सिरीसंगम के असीस सारथक होगे । ईसर किरपा ले उॅंखर तेलघानी के उद्दोग-बैपार दक्छिन म गोदावरी नंदी खॉड़ तीर राजमहेन्द्री तक फइलगे । लोगन माता राजिम ल ओखर भावभक्ति, जोगसक्ति, जस, वैभव के सेती राजमाता काहे ।
दुरिहा-दुरिहा ले लोगन सुख-सांति के कामना म लोचनभगवान अउ कोल्हेस्वर महादेव के दरसन, माता राजिम के असीस अउ दवई-गोंटी ले बर पदमावतीपुरी आए लागिन । ओखर जनमदिन मांघी पुन्नी म भारी भीड़ होए लागिस । खाई-खजाना के दुकान घलव बइठे लागिस । ये बिध हर बछर राजमाता राजिम के नाव म मांघी पुन्नी मड़ई सुरू होगे । माता के सिद्धि देखके कतको जन देवी के रूप म पूजा करे अउ सांति पाए ।
एक पइत पदमावतीपुरी म जेठ-असाड म लइकामन ल घाव-फुंसी होगे । दाई-ददामन कतको दवई-गोंटी करिन । फेर फायदा नइ होइस । लोगन राजमाता कर गोहार लगइन । माता अपन भक्ति अउ जोगसक्ति ले रद्दा बतइस के सीतलामाता देवाला म माता पहुॅंचानी करव । सेर-सिधा, तेल-हरदी धरके बैगा कर जावव । बैगा तेल-हरदी ल सीतलामाता के असीस लेके दिही तेला लइकामन के सरीर म लगाहू । एखर से ताप कम होके सरीर ह जुड़वास लगही । ये बिध ले लइकामन ठीक होगे । तब ले गॉंव म असाड़ म रथजुतिया के बाद सम्मार-बिरस्पत के जुड़वासा तिहार मनाथे ।
सावन म एक गॉंव म गाय-गरू ल कई किसम के बीमारी धर लिस । किसान गोसंइयामन चिंता म परगे । भागे-भागे राजमाता राजिम कर गिन । राजमाता जड़ी-बूटी के दवई बतइस । घरो-घर लीम डारा खोंचे बर कहिस । तब ले गॉंव म सावन म सवनाही मनाथे । सावन के पहिली सनिच्चर के मेड़ो बांधथे अउ इतवार के गॉंव बनाथे । हरेली म राउत भाईमन गाय-गरू बर जड़ी-बूटी के दवई बॉंटथे । घरो-घर लीमडारा खोंचथे । एक पइत खेत म बॉंवत के बाद बादर भगागे । अगास म बादर के नाम नहीं । खेत म पानी बिन धान सुखाय लागिस । त राजमाता अपन भक्ति अउ जोगसक्ति ले बादर के आहान करके बरसा करवइस ।
ओ बेरा म दुर्ग म जगपाल नाव के राजा रिहिस । राजा भगवान बिस्नु के पूजा-पाठ करे । एक दिन ओला लोचनभगवान ह सपना म पदमावतीपुरी म जनकल्यान खातिर मंदिर बनाए बर कहिस । भगवान के काहत देरी । बिहान दिन ले लोचनमंदिर के काम सुरू होगे । बेरा-बखत म मंदिर तियार होय के बाद दरबार म भगवान लोचन के सिद्ध मूरती बइठारे के बात होइस । दरबारीमन राजा ल बतइस के पदमावतीपुरी म भगवान लोचन अउ कोल्हेस्वर महादेव के परम भक्तिन माता राजिम रहिथे । ओखरे कर भगवान लोचन के सिद्ध मूरती हावे । ओखर भक्ति अउ सिद्धि पायके लोगन ओला राजमाता कहिथे ।
राजा जगपाल घोड़ा म सवार होके दलबल संग राजमाता राजिम कर पहुॅंचगे अउ लोचन भगवान के मूरती ल मांगिस । वो रातभर के मोहलत के बिनती करिस । ठीक हे, कहिके राजा दुर्ग लहुटगे । माता राजिम सपना म भगवान लोचन से बात करिस ।
हे भगवान ! राजा जगपाल तूॅं ल मंदिर म बसाय बर मांगत हे ।
हॉ, राजिम । जन-जन के सुख-सांति बर जरूरी हे ।
भगवान ! मंदिर म जाके मोल बिसार तो नइ दुहू ?
नहीं राजिम । मे तो सदा तोर मनमंदिर म रहूॅं । अपन तियाग के बदला कुछ मांग ले ।
महानंदी, पैरी, सोंधुर संगम सदा अमर राहे । सब सुख-सांति से राहे । अतका बिनती हे ।
में अपन से बरदान देवत हॅंव, राजिम । मोर नाव के पहिली, लोगन तोर नाम लिही अउ पदमावतीपुरी के नाव राजिम हो जाही ।
बिहान दिन, राजा-रानी दलबल संग पहिदगे । माता राजिम राजा जगपाल ल भगवान लोचन संग गोठ-बात अउ बरदान के बात ल बतइस । राजा जगपाल सहमत होगे । राजा अपन प्रभाव जनाय बर माता राजिम ल मूरती के वजन के बराबर सोना देके आदेस करिस । सैनिक तराजू के एक पल्ला म भगवान लोचन के मूरती अउ दूसर पल्ला म सोना रखिस । मूरती वाले पल्ला भारी अउ झुकेच रिहिस । राजा चकरागे । ओला लोकनिंदा जनाय लागिस । त अपन रानी के जम्मो जेवर ल उतरवाके तराजू म रखवइस । तभो ले मूरती वाले पल्ला भारी च रिहिस । राजा जगपाल सोंच म पड़गे । माता राजिम भगवान लोचन के सुमरन करके तुलसी चॉवरा के पैलगी करिस अउ एक ठन तुलसीदल तोड़के लइस । सबो सोना ल हटवा के तुलसीदल ल पल्ला म रखिस । भगवान लोचन के मूरती अउ तुलसीदल के दूनो पल्ला बरोबर होगे । राजा-रानी पानी-पानी होगे । मूड़ी निहारे माता राजिम के आगू म हाथ जोरके खड़ा होगे ।
राजा साहेब ! भगवान धन-दौलत, सोना-चांदी के भूखे नइ होय ।
सच कहे, माता राजिम । मेंहा मूरती ल अपन राजकोस ले हल्का समझ ले रेहेंव ।
अहंकार से कनो ह भगवान ल नइ जीत सके, राजा साहेब ।
ते मोर ऑंखी खोल देस, माता राजिम ।
तन-मन दूनों के ऑंखी खुले रहना चाही, राजा साहेब ।
ते धन्य हस राजिम । तोर दाई-ददा, कुल-बंस, ये माटी सबला प्रनाम करत हॅंव ।
नहीं राजा साहेब ! में तो इॅंखर बेटी ऑंव । ये सबके में बंदन करथॅंव ।
तोर सदा जय होवय राजमाता राजिम !
राजा-रानी मंदिर म बिधि-बिधान से भगवान लोचन के प्रान-प्रतिस्ठा करवइस । मंदिर म ’राजिमलोचन मंदिर’ लिखवइस अउ पदमावतीपुरी के नाव राजिम करवा दिस । राजा पुजारी ल कहिस के राजिमलोचन मंदिर के दीया सदा राजमाता राजिम के कोल्हेस्वर घानी के तेल ले बरना चाही । दरबारी अउ सैनिकमन ल चेतइस के आगू ले दुर्ग राजमहल म सदा कोल्हेस्वर घानी के तेल बउरना हे । मंदिर के चाक-चौबंद बेवस्था के बाद राजा-रानी दलबल संग राजधानी दुर्ग लहुटगे ।
राजमाता राजिम के सरी उमर भगवान बिस्नु अउ कोल्हेस्वर महादेव के भक्ति अउ जनसेवा म बितिस । बेरा-बखत म ओखर काया थके लागिस । बुढ़ापा आगे । बसंत पंचमी के दिन राजमाता रोज कस कोल्हेस्वर महादेव के भक्ति-पूजा करिस । ओखर बाद भगवान लोचन के भक्ति-पूजा करिस । पूजा करके मंदिर के चौंखट म बइठे-बइठे भगवान ल निहारत रिहिस । लोगन देखिस त ओखर काया मूरती बनगे राहे । जग ला सुख-सांति बँटाइया, परे-डेर, गिरे-हपटेमन ल सहारा देवइया, जन-जन के राजमाता राजिम भगवान लोचन अउ भगवान महादेव के सतलोकधाम चलेगे ।
लोकनाथ साहू "ललकार"
कहानीकार
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