हम इस बात के लिए पीड़ित और शर्मिन्दा महसूस करते हैं कि हमारे समाज के पास ग्रामीण व परिक्षेत्र स्तर के संगठनों के पास लाखों रुपए नगदी और मठ, मंदिर, आश्रम एवं खेत तथा सामाजिक भवन के रूप में करोड़ों रुपयों की अचल सम्पत्ति है, फिर भी हमारे समाज के युवा बेरोजगार हैं, हमारे लोग गरीबी में जीते हैं एवं शिकायत करते मर जाते हैं!
न तो हमारे लोग कभी स्कूल, कॉलेज तथा हॉस्पिटल खोलकर धन और सम्मान कमाने की सोचते हैं और न ही अपने बच्चों को देश विदेश के विश्व स्तरीय स्कूलों में पढ़ने भेजते!
आलम यह है कि हमारा समाज आज भी आदिम युग में जी रहा है। चंद लोग नेता, अधिकारी तथा कर्मचारी जरूर बन गए हैं, लेकिन अधिकांश की जिन्दगी आज भी खानाबदोश है!
क्या कभी हम सभ्यता के उच्च शिखर को छू सकेंगे? यह प्रश्न विचारशील सामाजिक कार्यकर्ता गणों को विचलित कर देता है! लोग भक्ति में इतने मस्त हैं कि सब सुध बुध खो दिए हैं! न इनको अपने सामाजिक स्वाभिमान व अस्मिता की चिन्ता है और न ही अपने पूर्वजों के इतिहास को जानने की जिज्ञासा!
क्या इस समाज के भीतर कभी सामाजिक चेतना आएगी? क्या कभी यह समाज ऊंचा उठेगा? क्या अपने पूर्वजों की भांति राजा बनकर हम कभी इस धरती पर पुनः स्वर्णिम युग ला पाएंगे?
पं. घनश्याम प्रसाद साहू
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Ghanshyam Prasad Sahu
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