एक बात गांठ बांध लो, आज जो तुम्हारी शारीरिक, मानसिक या आर्थिक स्थिति या अवस्था है, उसके लिए कोई दूसरा व्यक्ति, व्यवस्था, सरकार या देवी देवता जिम्मेदार नहीं है! तुम स्वयं जिम्मेदार हो! जब तुम यह जिम्मेदारी स्वयं उठा लेते हो, तो तुम्हारे उद्धार का मार्ग खुल जाता है।
तुम्हें खुद को अपनी नियमितता, श्रम साधना और योगाभ्यास से शारीरिक बल, वीर्य तथा उत्तम स्वास्थ्य को अर्जित करना है, बुद्धि बल तथा प्रतिभा को विकसित करना है और धन, सम्पदा प्राप्त करना है। तुम जब तक दूसरों पर आश्रित रहोगे, तब तक गुलामी का जीवन जिओगे। और यह बात सर्वविदित है कि गुलाम आदमी कभी सुखी नहीं रहता। तुम्हें अपने सपनों की दुनिया खुद रचनी होगी। अपनी बुनियादी जरूरतों को खुद पूरी करनी होगी! यदि तुम सोचते होगे कि कोई देवता आसमान से स्वर्ण मुद्राएं बरसा देगा या फिर कोई गड़ा धन तुम्हें मिल जायेगा अथवा कोई लाटरी लग जाएगी और तुम मालामाल हो जाओगे, फिर खूब मौज मस्ती करोगे, तो इस ख्याल को मन से हटा दो! जब तक तुम स्वयं धन कमाने योग्य नहीं हो जाते, धरती का कोई मनुष्य या स्वर्ग का कोई देवता तुम्हारी मदद नहीं करेगा! धन वहीं बरसता है, जहां पहले से कुछ धन जमा होता है। इस कहावत में पूरी सच्चाई है कि पैसा पैसे को और सोना सोने को आकर्षित करता है!
यदि तुम बीमार और अशक्त हो, तो संयम नियम का पालन करो और नियमित दिनचर्या अपनाओ। कुछ दिनों में अपनी खोई हुई जवानी और ताक़त हासिल कर लोगे! यदि तुम नियमित रूप से अच्छे लेखकों के विचार पढ़ोगे, अध्यवसाय करोगे और कला कौशल का अभ्यास करोगे, तो तुम्हारी बुद्धि कुशाग्र हो जाएगी। तुम्हारा तर्क बुद्धि संगत, न्याय संगत हो जायेगा। तुम अच्छा सोचना, अच्छा बोलना और अच्छा लिखना सीख जाओगे! लगातार परिश्रम और पुरुषार्थ से अपनी जरूरत के अनुरूप और इच्छानुसार धन का अर्जन कर लोगे! अधिक परिश्रम से अधिक लाभ कमा लोगे। अपनी बुद्धि, विवेक, सद्व्यवहार, कार्य कुशलता तथा दान, दया अपनाकर सामाजिक पद, अधिकार और सम्मान भी प्राप्त कर लोगे! तुम्हें सरकार के किसी विभाग में अच्छी नौकरी भी मिल जाएगी!
अपनी दरिद्रता से अकेले मत लड़ो, क्योंकि अकेले लड़ने से तुम थक जाओगे। संभव है जिन्दगी से हार मानकर, दुःखी और निराश होकर अपनी जीवन लीला ही समाप्त कर लो! इसलिए परिवार को साथ लो, मित्रों से परामर्श करो या किसी विवेकशील और अनुभवी व्यक्ति से जीवन जीने की कला सीखो! तुम पाओगे, तुम्हारा भार कम हो गया है, तुम्हारी पीड़ा मिट गई है!
यह मान लो कि दुःख दरिद्रता, शारीरिक स्वास्थ्य तुम्हारे अपने अज्ञान और अकर्मण्यता का परिणाम है। प्रकृति के किसी नियम को नहीं समझने या उसे तोड़ने की वजह से तुम बीमार या कमजोर हो गए हो! तुम्हारे दुखों, अभावों और असफलताओं का कारण तुम स्वयं ही हो! यदि तुम इस सत्य को स्वीकार लेते हो, तो इससे तुम्हें वेदना नहीं होगी। तुम फिर स्वयं के उत्कर्ष के लिए तत्पर होवोगे! इसलिए सारा ध्यान स्वयं पर केंद्रित करो और अपनी कमी, कमजोरियों तथा निम्न स्तरीय सोच तथा गलत आदतों पर अंकुश लगाओ। तुम स्वयं ही खुद को सुधार सकते हो, स्वयं को ऊंचा उठा सकते हो, स्वयं ही स्वयं का उपकार और उद्धार कर सकते हो! इसलिए किसी दूसरे का अवलंबन मत लो! आत्मावलंबी बनो! इससे तुम्हारा आत्मविश्वास आसमान को छुएगा! तुम्हारी अंतः शक्ति और चेतना जागेगी और तुम्हारा धन्यवाद करेगी। तुम्हारा जीवन कृतकृत्य हो जाएगा!
जब तुम अपने स्वयं के प्रयास से संसार के चक्रव्यूह को तोड़ने में सफल हो जाओगे, तो आसमान के देवता भी तुम्हारा अभिनंदन करेंगे और भगवान भी तुम्हें अपने हृदय से लगाकर प्यार जताएंगे। संसार की वास्तविकता को समझो और परिस्थितियों पर अपना नियंत्रण करो। सही समझ विकसित होने पर तुम्हारे जीवन की दिशाधारा बदल जाएगी। फिर तुम्हें उपयुक्त कार्य को निर्धारित करने और मोड़ने में सफलता मिल सकेगी। अपने भीतर की दुर्बलताओं और विकृतियों को अपनी ही कमी समझकर धैर्यपूर्वक सुधारने का प्रयास करो और अपनी श्रेष्ठ वृत्तियों औ सद्भावना को बढ़ाने का प्रयास करो!
इस यथार्थ को समझ लो कि तुम्हें स्वयं ही अपना उद्धार करना है, दूसरा व्यक्ति तुम्हें सुधारने और ऊंचा उठाने में सक्षम नहीं है! इसलिए किसी देवता पर आश्रित मत रहो, किसी अवतार का इंतजार मत करो!
पं. घनश्याम प्रसाद साहू
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Ghanshyam Prasad Sahu
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