समाज की आधी आबादी नारी है। इसलिए कहना न होगा कि नारी शक्ति की उन्नति से ही समाज का उत्थान संभव होगा। जिस समाज और संगठन में नारी शक्ति को सम्मान और स्थान दिया जाता है, वह समाज सर्व समाज में सम्मानित होता है।
अब प्रश्न उठता है कि नारी शक्ति का सम्मान कैसे किया जाए? उत्तर है, नारी शक्ति को घर परिवार और समाज में उनको अपनी भूमिका निभाने का अवसर दिया जाय! उनकी प्रतिभा, क्षमता और योग्यता का सम्मान करते हुए उनका नियोजन किया जाय। उनको कमज़ोर, असहाय और अयोग्य न समझा जाय! बहन बेटियों की चेतना, ऊर्जा और शक्ति को जगाने और अधिक उपयोगी बनाने के लिए उनको व्यवस्थित रूप से शिक्षित और प्रशिक्षित किया जाय। उनकी शुचिता, पवित्रता और हार्दिकता को समाज के नव निर्माण का आधार बनाया जाय! उनके हृदय में सबके प्रति स्नेह ममता और दया करुणा होती है। समाज में परस्पर जुड़ाव के लिए यही सद्गुण भविष्य में उपयोगी सिद्ध होंगे!
आज की नारी शिक्षा, पद और सम्मान तथा अधिकार प्राप्त कर अनेक क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति दर्ज करा अपना लोहा मनवा चुकी है। वह शिक्षिका, पुलिस, सेना, डॉक्टर, वैज्ञानिक, कवि, रंगकर्मी, सिने तारिका, खिलाड़ी, साहित्यकार, शोधार्थी, कम्प्यूटर प्रोग्रामर, इंजीनियर, पायलेट, प्रशासनिक अधिकारी, विधायक, सांसद, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री आदि बनकर देश के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही है!
इतना सब कुछ होते हुए भी आज भी उसका वह सम्मान परिवार और समाज में नहीं है, जैसा कि होना चाहिए। इसके पीछे की ख़ास वजह यह है कि आज भी व्यक्तिक, पारिवारिक अथवा सामाजिक फैसला वह नहीं लेती, नहीं ले पाती अथवा उसे फैसला लेने का अधिकार नहीं दिया जाता, बल्कि उसके जीवन का सभी फैसला उसके पिता, भाई, पति या पुत्र द्वारा लिया जाता है। यह सामान्य घटना नहीं है। समाज आज भी नारी शक्ति को दोयम दर्जे का इंसान ही समझता/ मानता है और उसको वही स्थान देता है। देश और दुनिया में विविध रूप से विकसित और स्थापित होने के बावजूद नारी शक्ति सामाजिक रूप से आज भी केवल घर बाहर और मंच की शोभा बनी हुई है। वह प्रमुख और निर्णायक भूमिका में नहीं है। जाने अनजाने नारी भी उतने में ही संतुष्ट और प्रसन्न रहती है। इस स्थिति से उनको ऊपर उठाने और आगे बढ़ाने की जरूरत है। अब हमारा कर्त्तव्य है कि समाज एवं सामाजिक संगठन में नारी शक्ति की भूमिका और भागीदारी को सुनिश्चित करें!
इसके लिए बहन बेटियों को आपस में मिलने जुलने, बातचीत करने, सामाजिक, सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करने और नारियों के हक में कुछ निर्णय लेने की सुविधा देनी होगी। धीरे धीरे उनके भीतर हिम्मत और आत्म विश्वास जागेगा। फिर भविष्य में स्वयं से सब कुछ कर पाने में सक्षम होगी। इस स्थिति को निर्मित करने में पुरुष वर्ग को सहयोगी की भूमिका निभानी होगी। इस प्रकार नारी शक्ति का नया अवतार प्रगट होगा।
जिस दिन हमारा समाज यह सब कर पाने में सफल होगा, समाज की सारी जड़ता और मूढ़ता, दीनता और हीनता समाप्त हो जायेगी और अपना समाज सभ्य समाज के रूप में स्थापित हो जाएगा!
पं. घनश्याम प्रसाद साहू
संपादक छत्तीसगढ़ संदेश
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