शिव शंकर अंतर्यामी है,,,,अद्भुत है और निराला है।
पूर्णिका
शिव शंकर अंतर्यामी है,,,,,अद्भुत है और निराला है।
भोले भक्तों को भोला है,,,,,दुष्टों को बनता भाला है।
माता गौरी के अजर पति,अविनाशी योगी संत यति,
विषधर भुजंग की गले माल,गंगा सिर धरने वाला है।
रहते निज सहज समाधि में,स्थिर रहते हर आंधी में,
जपते रहते हैं राम मंत्र,जो जीवन सहज संभाला है।
कालों के काल कहाते है,प्रति पल कृपा बरसाते हैं,
भक्तों की रक्षा करते हैं ऐसा स्वाभाव मतवाला है।
मानस के प्रथम रचयिता हैं,ये गाते निर्मल कविता है,
चिंतन करते हैं मानस का,इस के दम पीते हाला है।
डमरू वाले , कमाल करते हो।
पूर्णिका
डमरू वाले, कमाल करते हो।
भक्तों को मालामाल करते हो।
जो भी मांगे वो देते हो उसको,
सच में सबको निहाल करते हो।
जो भी कष्टों को लेके आता जब,
तब ही उसको खुशहाल करते हो।
जो भी आता , तुम्हारे चरणों में,
उसको सचमुच बहाल करते हो।
जो भी आता तेरी शरण स्वामी,
उसकी तुम देखभाल करते हो।
राम का नाम जाप करते सदा,
निर्मल मन का मलाल हरते हो।
आंखों से आँसू बहते है,मन की पीड़ा किसे दिखाऊं।
महिला दिवस
आंखों से आँसू बहते अब,मनकी पीड़ा किसे दिखाऊं।
महिलाओं की लुटे आबरू,कैसे महिला दिवस मनाऊं।
अखबारों में पढ़कर खबरें,मस्तक शर्म से झुकजाता है,
हुआ विकास देश का ऐसा तो,लगता अब मैं मर जाऊं।
युग बदला पर सोच न बदली,ये कैसी शिक्षा,दीक्षा है,
जब तक सोच नही बदलेगी, कैसे नारी पर इतराऊं।
कभी गर्भ में मारा हमने ,कभी बने हत्यारे रक्षक,
इतना गहरा दर्द उठ रहा दुखित बहुत,संगीत सुनाऊं?
डगर डगर पर ताने सुनती,सचमुच धीरज की देवी है,
नारी जीवन सिर्फ समर्पण,क्या मैं सचमुच न मुस्काऊं।
सबके दर्द समझके अपने,पीड़ा बहुत सताती मुझको,
लिखता जबसे बहते आंसू,कबतक निर्मल नीर बहाऊं।
सीताराम साहू 'निर्मल' छतरपुर मप्र
Ghanshyam Prasad Sahu
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