रविवारीय प्रेरक प्रसंग
कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म इन दो बातों की विनोबा जी ने गीता समझने की गुरुचाबी बताई है । कर्म में अकर्मक- योग और अकर्म में कर्मसन्यास विनोबा जी की मूलवृत्ति थी, संन्यास की। किंतु गांधी जी के संपर्क में वे आये और उनका पूरा जीवन प्रचंड कर्मयोग का एक जीवंत उदाहरण ही बन गया।
1916 में वे गांधी जी के पास आये। 1966 में उन्होंने सूक्ष्म प्रवेश का अपना इरादा जाहिर किया। सूक्ष्म प्रवेश की उनकी परिभाषा का किसी ने अर्थ पूछा, तो कहा सामान्य स्तर से सोचेंगे तो चिंतन से ज्यादा शक्ति वाणी में है और वाणी से ज्यादा शक्ति क्रिया में है। लेकिन जहां चित शून्य हो जाता है वहां क्रिया से ज्यादा शक्ति वाणी में और वाणी से ज्यादा शक्ति चिंतन में आती है।
कभी कहते थे जीवन के आखिरी क्षण तक स्थूल कर्म करते रहना यह एक विचार है। मेरा विचार पहले से वैसा नहीं। स्थूल कर्म के बाद सूक्ष्म कर्म करें, उसके बाद वह भी छोड़ दें, यह मेरी दृष्टि है।
मरने के बाद सब समाप्त होने वाला है तो जीवित रहते हुए मरने का अनुभव करें। संत तुकाराम का एक वचन वे बार -बार दोहराते थे, जिसका अर्थ है, "मैंने अपनी मृत्यु अपनी आंखों से अच्छी तरह देखी और वह एक अनुपम उत्सव था!"
दिनेंद्र दास
कबीर आश्रम करहीभदर
अध्यक्ष मधुर साहित्य परिषद् तहसील इकाई बालोद, जिला- बालोद छग
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