April 20, 2024   gpsahu



प्रकाश की ओर चलें, ज्योति का अवलंबन लें..

ईश्वर से साझेदारी हर दृष्टि से नफे का सौदा: पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

"छाया" को पकड़‌ने के लिए दौड़ने वाले के पल्ले केवल थकान और खीज ही पड़ती है। इसके विपरीत "प्रकाश" की ओर मुँह करके चलने वाले को सहज ही यह लाभ मिलता है कि छाया उसके पीछे -पीछे चलने लगे। छाया की ओर भागने वाले का फोटो खींचने पर उसका चेहरा काला होता है, किंतु "प्रकाश" की ओर चलने वाले का छाया चित्र प्रकाश से भरा -पूरा स्वच्छ और स्पष्ट दिखाई पड़ता है। ईश्वर "प्रकाश" है और काया- "छाया", वासना, तृष्णा और अहंता का सम्मिश्रण "माया" कहलाता है। उन्हें पूरा करने के लिए मनुष्य का पुरुषार्थ कम पड़ता है। उपार्जन की एक सीमा है, किंतु तृष्णा असीम है। महत्त्वाकाँक्षाओं का कहीं अंत नहीं। उपभोग और संग्रह से तृप्ति किसी को नहीं मिली। हिरण्याक्ष, रावण, कुबेर, सिकंदर जैसे सुसंपन्न समझे जाने वाले प्रबल पराक्रमी व्यक्ति भी अभाव और असंतोष का ही रोना रोते मरे। आग पर घी डालते रहने से वह बुझती कहाँ है, उल्टे भड़कती है, न संग्रह की ललक पूरी होती है और न अहंकार संतोष दिलाने में इंद्र जितना वैभव भी पर्याप्त सिद्ध होता है। तृप्ति और शांति मृग -तृष्णा में भटकते रहने पर भी कहाँ मिलती है ? यह छाया के पीछे दौड़ना हुआ। इस भगदड़ में मिलता तो कुछ नहीं; जीवन के बहुमूल्य क्षण खोते, अशांति के गर्त में गिरते और नष्ट होते चले जाते हैं। आतुरता, अवांछनीयता का मार्ग पकड़ती है। फलतः पापों और अपयश की गठरी और अधिक बोझिल होती चली जाती है।

यही है लोक प्रवाह जिसमें कूड़े -करकट की तरह लोग किसी अनिश्चित दिशा में निरुद्देश्य बहते चले जाते हैं। रोते -कलपते जिंदगी के दिन गुजारने वाले, मरते समय अपनी मूर्खता पर भारी पश्चात्ताप करने वाले प्रायः इसी मनःस्थिति के होते हैं। माया ग्रस्त - भव बंधनों से जकड़े हुए -अज्ञान के अंधकार में भटकने वाले प्राणी प्रायः यही भूल करते हैं। उन्हें माया के ही सपने दीखते हैं। यह कोई सुझाता ही नहीं कि यह मृग- मरीचिका भी है, इससे असंतोष और अपयश के अतिरिक्त और कुछ मिलने वाला नहीं है।

बुद्धिमत्ता इसी में है कि मनुष्य "प्रकाश" की ओर चले। ज्योति का अवलम्बन ग्रहण करे। ईश्वर के सान्निध्य में ही आलोकवान जीवन जीने का आनंद तथा प्रकाश स्तंभ की तरह भटकाव में असंख्यों को बचाने का श्रेय लाभ इस दूरदर्शिता को अपनाने वाले प्राप्त करते हैं। ईश्वर की साझेदारी जिस जीवन में बन पड़ेगी उसमें घाटा पड़ने की कोई संभावना नहीं है। यही शांति और प्रगति का सुनिश्चित मार्ग है।

(ईश्वर से साझेदारी हर दृष्टि से नफे का सौदा पुस्तक पृष्ठ-१३ से)

हम सभी सदसहित्य का नियमित रूप से स्वाध्याय और सत्संग करें। यह जीवन की मूरि है, सुधा है, अमृत है ! ऐसे साहित्य जो सद्कर्म करने की प्रेरणा देते हों, मनोबल जगाते हों, मन की हीनता, दीनता और उदासी को हटाते हों और आशा, उत्साह, आनंद का संचार करते हों !

इस दृष्टि से अचार्यश्री के साहित्य आज की पीढ़ी के लिए अमृतोपम हैं !


पं. घनश्याम प्रसाद साहू, संपादक छत्तीसगढ़ संदेश रायपुर 8269970135, 7987278335


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