1
उस दिन मेरा सिर तुम्हारी छाती पर था। और हम महज़ कुछेक लम्हों में ही सैकड़ों बार नींद से जागे, सैकड़ों बार सोये थे। बावजूद इसके आंखें बोझिल थी, बिलकुल उनींदी। ऐसा लग रहा था कि कोई सपना अधूरा रह गया है। जिसे पूरा करने की जल्दी में हम दोनों खुदको समेटना भूल गए। कितना कुछ छूट गया उस छोटे से किराये के घर में। कितना कुछ बिखरा रह गया है।
एक बार जाना चाहता हूं, उन्हीं को समेटने।
क्या वह सबकुछ आज भी मौजूद होगा? वह किताबें? वह फ़र्श पर बिखरे तुम्हारे नोटबुक के पन्ने? वह टिकटिक करती दिवाल घड़ी? कैन्डल स्टैण्ड? कितनी कम चीजें थीं, फिर भी कितनी ज्यादा, जो आज भी स्मृतियों में शेष हैं। वह चार कुर्सियों से सजी लकड़ी की मेज! ना जाने हम दोनों ने किस उम्मीद में खरीदी थी। हम दो ही तो थे? फिर कुर्सियां चार क्यों? आज तक नहीं समझ में आया।
क्या तुम्हें वह खिड़की याद है? जो एक- दो बारिश के बाद जाम हो जाती थी। उन दिनों तुम्हें खिड़की पर बैठने की आदत थी। मुझे दिवाल से लगकर नंगे फ़र्श पर!
कितने अजीब दिन थे? उतने ही खूबसूरत। तुम्हारे नखरे, और मेरी शरारतें। फर्श ! जहां मैं बैठता था। आइना ठीक उसके सामने था। तुम खुले आसमान को देखती रहती थी और मैं तुम्हारी उघाड़ पीठ को।
पूरी दुनिया एक खाली कैनवास सी लगती थी। कल्पनाओं और उम्मीदों का कितना विस्तृत दायरा हुआ करता था?
क्या तुम्हें वह सिंगल बेड याद है? जिसे खरीदने को लेकर हम दोनों की तूतू- मैंमैं आपसी झड़प में बदल गई थी। अब तो हम रोज झगड़ते हैं, कभी पानी तो कभी बिजली के बिल को लेकर। वह तीन साल के सफर में हमारी पहली झड़प थी।
मैं अपनी औकात के मुताबिक डबल बेड खरीदना चाहता था। तुम जिंदगी के मुताबिक सिंगल। तुम्हारा मानना था कि सिंगल बेड होगा तो हम दोनों ज्यादा करीब रहेंगे ! गुस्से की स्थिति में भी हम दोनों एक दूसरे को करीब से महसूस कर पाएंगे।
पर हम कहां ठहर पाये उस जगह पर?
जिंदगी की भागदौड़ में कितना कुछ बदल गया। बड़ा घर, बड़ी गाड़ी, बड़ा ओहदा, बड़े लोगों की संगत। जिंदगी की भागदौड़ में कितना कुछ पीछे छूट गया?
जिंदगी की भागदौड़ में हम दोनों ना जाने कहां अपने आप को छोड़ आएं। हम घर ही नहीं छोड़े। उन छोटे- छोटे घरों में अपनी जिंदगी तक को छोड़ आएं हैं।
एक बार जाना चाहता हूं ! उन्हें ढूंढने जो मेरे 'मैं' थे।
वहां कुछ हो या ना हो? वह सीलन भरी दिवारें तो होंगी ही जो मुझे एक बार फिर से मेरी गुजरी हुई जिंदगी की याद दिला सकें। हमने सिर्फ वक़्त नहीं खोया है। हमने सिर्फ दिन महिने साल नहीं खोये हैं। हमने अपनी जिंदगी भी खोई है। हमने खुदको खो दिया है।
काश ! एक लम्हा भी हम दोनों ने एक दूसरे के लिए बचाकर रखा होता।
संजय सेफर्ड
2
जब मेरे पास मूंछ और दाढ़ी नहीं थी
मुझे मूंछ और दाढ़ी वाले लोग अच्छे नहीं लगते थे
और मेरी प्रेमिका
जो प्रेमिका भी नहीं थी
ठोड़ी पकड़कर अक्सर कह दिया करती थी कि
इतना भी नहीं कर सकते ?
चुभता है
और मैं उस दो- चार खूंटी दाढ़ी को भी
एक चुम्बन की खातिर कुर्बान कर दिया करता था
धीरे- धीरे उम्र के साथ हम दोनों बड़े हुए तो
व्यस्ताएं भी बढ़ने लगी
और जिन्दगी ने अपने हिस्से कई और भी झमेले पाल लिए
और वह प्रेमिका जो मेरी प्रेमिका भी नहीं थी
एक होकर भी कई प्रेमिकाओं में तब्दील हो गई
मुझे पहले दुख हुआ
फिर सकून मिलने लगा तो
मैं भी कई प्रेमियों के व्यक्तित्व को
अपने खाली जेब में रखकर अक्सर चलने लगा
इस बीच दाढ़ी और मूंछ दोनों ही बड़े होते गए
और ऐसे ही किसी प्रेमिका ने
जो मेरी प्रेमिका थी कि नहीं
इस बात को लेकर संशय था ! अभी भी है। ने कहा कि
दाढ़ी तुम पर अच्छी लगती है !
रखा करो तुम
इसे देखकर कम्पलीट मैन वाली फीलिंग आती है
तुम थोड़े जवान से दिखते हो
पुरानी बातों को भूला
एक विश्वासपात्र प्रेमी की तरह
मैं उसकी तरफ देखने लगा
सहसा उसने मुझे चूमा
और मुझे मेरे हॉल पर छोड़ वह कहीं दूर निकल गई
मैंने उसका इन्तजार किया
इस उम्मीद में दाढ़ी परस्पर बड़ी- घनी होती रही
और कम्पलीट मैन वाली फीलिंग ने
एक बार हाथ पकड़ा तो फिर कभी छोड़ा ही नहीं
परन्तु अब वर्षों बाद
जब कभी अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरता हूं तो
दो- चार सफ़ेद बाल टूटकर हाथ में आ जाते हैं
मेरी हालत देख लोग कहते हैं कि
उसकी यादों ने मुझे देवदास बना दिया है
और मैं यह सोचकर हैरान हूं कि
आजकल कुछ चुभता क्यों नहीं ?
चोट खाते- खाते
कहीं वह दर्द भी नश्तर तो नहीं हो गया ?
- संजय शेफर्ड
3
मैंने देखा है आधी उम्र की शादीशुदा औरतों को
झूठी मुस्कुराहट से लदी तस्वीरें लगाती
अपने ही सच को छुपाती हुई.....
ससुराल औऱ मायके की
उम्मीदों का बोझ ढोती हुई
रिश्तों के जाल में उलझी
जिम्मेदारी से बंधी हुई.......
थोपे हुए या गलत लिए फैसलों की
सजा से बाहर निकलकर
खुल के जीना चाहती हैं
कुछ पल अपने लिए
समेट लेना चाहती हैं
अपनी ख्वाहिशों के खालीपन को
भरना चाहती हैं
किसी को अपनेपन से लिपटकर
जी भर के रोना चाहती हैं
चाहती है किसी रिश्ते से बंधे बगैर
कोई हो..दोस्त से बढ़कर और प्रेमी से कुछ कम
उदासियों का हमसफर हो ..दर्द का साझेदार..
तकलीफ में हौसला बने और
तन्हाई में दिल का सुकून और करार
फिर...
मर्यादा की बेड़ियां और
लाँछन का डर रोक देता है
बढ़ते हुए कदमो को
पिंजरे में कैद पंछी की तरह
खामोशी का शोर छटपटाता रहता है.....!!
@topfans Alfaaz
ग़ज़ल
निगाहों से दिलकश इशारे हुए हैं
हम उनके हुए वो हमारे हुए हैं
हसीं चांद आगोश में खो गया
यही देख , बेचैन तारे हुए हैं
बहाए हैं हमने आंखों से दरिया
समंदर तभी से ये खारे हुए हैं
भला मौत उनको हराएगी क्या
जिंदगी से ही जो हारे हुए हैं
तुम्हारी आँखों से देखूं मैं दुनियां
मुकम्मल मेरे ख़्वाब सारे हुए हैं
कुछ ऐसे डूबे मोहब्बत में तेरी
बहुत दूर हमसे किनारे हुए हैं
हकीकत में ढल जाएंगे वो सारे
ख़्वाब जो दिल मे उतारे हुए हैं
सन्जू श्रृंगी कोटा, राजस्थान
Ghanshyam Prasad Sahu
+91-79872 78335
chhattisgarhsandeshnews@gmail.com
© Chhattisgarh Sandesh. All Rights Reserved. Developed by TechnoDeva