हौसला
हौसला अगर बुलंद है ,
तो साथ देगा जमाना ।
गगन के तारे तोड़ सकेंगे,
अगर आपने ठाना।
भले हो कोई बेबस लाचार
करें न कभी इसका सोच।
दौडते रहते है वे भी बन्दे
जिनके पाव मे आया मोच।।
अधिकार के लिये संघर्ष करो,
चाहे पड़े, मौत को गले लगाना।
क्योंकि हौसला अगर बुलंद है,
तो फिर साथ देगा जमाना ।।
आसमां के तारे भी होंगे,
तेरे फौलादी पांव के तले।
सागर मे मोती तलासते रह,
परवाह न कर जान जाय भले।
2
ओ जवानी भी, क्या जवानी है।
खौलता हुआ खून नहीं, पानी है।।
जुल्म सितम सहते रहोगे कब तक,
अब लोहे का चना, उसे चबानी है।।
सब्र करने की होती है एक सीमा,
बेसब्री से हमे अब, ताकत दिखानी है।।
नाचते रहे, दुसरो के ऊगलियो के इशारे,
अब दूसरों को अपनी उगली पे नचानी है।।
कब तक उजड़ा हुआ रहेगा चमन,
बागों मे बहार ,अब तो हमे लानी है।।
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3
दुश्मन भी गले मिलेंगे,
ये सच है सोलह आना।
क्योंकि हौसला अगर बुलंद है
तो साथ देगा जमाना ।।
दुनिया तुमसे सबक लेगा,
सदैव मस्तक ऊँचा करने।
आसमां के भी अश्रु टपकेगा,
जब तेरे वक्त आएगा मरने।।
धरती से अम्बर तक विजय की
स्वर्ण सीढ़ी, तुम्हें है बनाना।
क्योंकि हौसला अगर बुलंद है
तो साथ देगा जमाना ।।
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4
मेरे अरमान को, मिट्टी में मिलाने वाले ।
सपनों के महल को, खाक मे मिलाने वाले।।
क्या जुल्म ढाते नहीं, अक्सर तुमने,
दूध के प्याले मे नशा पिलाने वाले।।
ये तो मुकद्दर का खेल, है वरना,
कौन आता यहाँ, सम्भालने वाले।।
क्या गुस्ताखी किया, किसने तुम पर,
बेवजह सजा तू , किसी को दिलाने वाले।।
कोई कीचड़ उछाले हम पर कितनों,
हम कीचड़ मे भी कमल खिलाने वाले।।
गिरगिट की तरह रंग बदलता है तू,
खंजर से वार कर मरहम लगाने वाले।।
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5
सांस है चार दिनो का
ए सांस है चार दिनो का ,फिर टुट जाना है।
ऊपर वाले की मर्ज़ी, उसे कब रूठ जाना है।।
सास है ए चार दिनो का ....।
ए सास है उधारी की, ईश्वर ने हमे दिया।
ऊपर वाले देखता है, कि किसने क्या किया।।
सास है ए चार दिनो का ....
ए घर अटारी बंगला,चाँदी सोना हीरा मोती।
अंत समय साथ मे, सिर्फ लपेटे गा एक धोती।
ए सास है चार दिनो का .....।
ए दुनिया का ब्यवहार,मतलब पर टिका है।
सत्य ईमान, न्याय, धरम, पैसे मे बिका है।
ए सांस है चार दिनो का ......
आने वाले को जाना है, ये बात रखो याद मे।
वेटिंग लिस्टमें है सब, कोई पहले कोई बादमे।
ए सांस है ये चार दिनो का...।
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6
मेरा धरम और तेरा धरम
मेरा धरम, तेरा धरम, इसी बात का झगड़ा है।
धर्म नाम पर पीटते,अलग ढिढोरा डफड़ा है।
बस इसी बात का झगड़ा है ।
कोई पहनते धोती पगड़ी, कोई टोपी पैजामा कपड़ा है।
कोई सेवा करते पाँव दबाते, कोई गला दबाने पकड़ा है।।
बस इसी बात का झगडा है।
कोई लगाते जख्मो पे मलहम, कोई नमक मिर्च रगड़ा है।
दुसरे को समझते हीन कमजोर, अपने को समझते तगड़ा है ।
बस इसी बात का झगड़ा हैै ।।
अपने को समझे शेर बाघ, औरो को समझे गाय बछड़ा है।
औरो को समझे मुक पशु,अपने को समझे शेर जैसा जबड़ा है।।
बस इसी बात का झगड़ा है ।
सबका धर्म मानव धर्म, बेकार कोई क्यो अकड़ा है।
यम घसीटते ले जाएगा, न घोड़ा गाड़ी न छकड़ा है।।
बस इसी बात का झगड़ा है।
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7
ए जिन्दगी क्या तमाशा है ?
कभी चित, कभी पट, फेंकने का पासा है।
जिस जबान से,सत ईमान के पाठ करे।
उसी जबान से झूठ प्रपंच सांठगांठ करे।
सज्जन के संगत करके,
दुर्जन से चिपके जैसे लासा है।
ए जिन्दगी क्या तमाशा है ।
नसीहत देते बहुत बड़े लगते हो सुजान।
फिरभी कुपथ गमन मे, बाढ़े तेरे रूझान ।।
समझाने बुझाने के बहाने मे,
खुद लगे झंझट झांसा है।
ए जिन्दगी क्या तमाशा है ।
अपने खातिर क्या क्या करे करम नहीं ।
आदमी आदमी के बीच जाने धरम नहीं ।।
जिन्दगी बीत गए सुधार करते,
पर बदले न तोला मासा है।
ए जिन्दगी क्या तमाशा है ।।
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8
माँ
माँ, तेरे आँचल के छाँव तले,
मिट जाती दुनिया का अवसाद।
ममता मूरत वात्सल्यमयी,
दिये हमे असीम आशीर्वाद ।।
हे माँ किन शब्दों में बखान करूँ,
तेरे इस स्नेह सागर गरिमा को ।
आकाश से ऊँचा, पाताल से गहरा,
तेरे इस महान महिमा को।।
जनम जनम आपके ही पुत्र बनू ।
ऊऋण होने की अभिलाषा ।
मृग मरीचिका जस ढूढ रहा,
फिर भी है एक आशा ।।
रचयिता: मोहन सोनी करगी रोड कोटा जिला बिलासपुर छग 9926947455
Ghanshyam Prasad Sahu
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