"हे स्वामी ! सेठ को नरक में क्यों भेज रहे हैं? उन्होंने तो जीवन भर आपकी पूजा-आराधना की, आपके ऊपर बिना जल समर्पित किये पानी तक नहीं पीते थे ; परंतु आप इसे नरक में स्थान दे रहे हैं।"
पार्वती की बातों को सुनकर भोलेनाथ ने कहा, "प्रिये! तुम ठीक कहती हो। इस आदमी ने मेरी पूजा- आराधना की है, मेरी भक्ति की है; परंतु उनकी भक्ति दिखावा की थी।
सुनो, इसकी दुकान ढंग से नहीं चलती थी। इस बनिया ने अपनी दुकान के ठीक सामने सरकारी जगह में मुझे स्थापित किया, ताकि शिवजी के साथ ही मेरा भी व्यापार चले और यही हुआ। अभी मेरी पूजा- पाठ में जो सामान चढ़ता रहा उसे सेठ देते रहे। वह भी पासिंग मार कर देता था, इस सेठ ने कितनों को सामान देकर समय से रुपए नहीं देने वालों की जमीन हड़प लिया। शुद्ध सामान नहीं रखता था और माल अधिक कीमत में बेचकर गरीबों का खून चूसा है, इसलिए इसका ठौर नरक में ही होगा।"
पार्वती बोली, "आपके पूजा- पाठ, सेवा- आराधना करने का कुछ फल तो होना चाहिए। नहीं तो श्रद्धालु आपको छोड़ देंगे।"
"प्रिये! मैं किसी के पूजा- आराधना से खुश नहीं होता हूं, लोगों की मर्जी है कि वो पूजा- पाठ करते हैं। हां! इतना जरूर है पूजा- पाठ करते समय मन में सात्विक भावना होती है। उनसे गलत काम नहीं होता है; परंतु मात्र पूजा- पाठ से किसी व्यक्ति की सद्गति नहीं होगी। कोई बेटा, केवल पिता का नाम जपता रहे उसे बैठाकर रात - दिन उसकी वंदना आरती करें ,परंतु आज्ञा ना माने, सत्कर्म ना करें तो क्या पिता खुश हो सकता है? यही हाल मेरा है !
"मैं कर्म सिद्धांत को मानता हूं। कर्मों का फल सबको भोगना पड़ता है चाहे भगवान हो या भगवती...!"
*कर्म कमाई आपकी, ना माई ना बाप की।*
लेखक
दिनेंद्र दास, कबीर आश्रम करहीभदर
अध्यक्ष, मधुर साहित्य परिषद् तहसील इकाई बालोद, जिला- बालोद छग मो. 8564886665
Ghanshyam Prasad Sahu
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