April 29, 2024   gpsahu



जल का कोप: कहानी

कभी कभी जीवनदाई जल विनाशकारी हो जाता है.

जीवनदायनी जल भी कोप कर सकता है, मेरी समझ के बाहर था, पर उसे करीब से देखा था। करीम कह रहा था कि पाप से भरा पड़ा तो फटेगा ही। रेवा है क्यों जल ने तांडव किया? रमन कहता है -इसी तरह प्रकृति हमें सबक देती है अब नया जीवन शुरू होगा। सुखरु अपने टूटे घर की छानहीं पर बैठा एक एक सक्क देख रहा था। वो सोचता है कि मैंने तो किसी का कुछ नहीं बिगाड़ा था। रोज स शंकर जी में जल चढ़ाता था फिर मेरा ही घर क्यों गिरा? मेरा पूरा परिवार बहा कि उसका घर मिट्टी का था सो घुल कर गिर गया और बाकि सब मकान ईटी से मजबूत थे इसलिए नहीं गिरे। घर की गिरी छत पर बैठा अपने परिवार का इंतका करता सुखरु, दो दिन से खाना भी नहीं खाया था।


शांत हुआ जल प्लावन, अपनी विनाश लीला दिखा चुका था। उसके अवशेष उसकी दास्तान सुना रहे थे। खेतों पर मिट्टी जमी थी। कई गांवों की फसल बह चुकी थी। छह-सात फीट ऊंचाई पर पेड़ों पर कचरा फंसा था। कहीं कपड़े तो कहीं पर प्लास्टिक के डिब्बे पड़े थे। सैकड़ों लोग स्कूल में रुके थे। जिनके घर थोड़े-बहुत सही सलामत थे, वहीं लोग लौटने लगे थे। कुछ घरों में चूल्हे भी जलने लगे थे।


सुखरु तो कोई मदद लेने को तैयार नहीं था। उसने स्कूल में बने खाने को भी नहीं स्वीकारा। हैलीकॉप्टर से गिराए गए पैकेट सामने ही पड़े थे। सुखरु ने उन्हें हाथ भी नहीं लगाया। खपरे में बैठा सुखरु याद कर रहा था अपने बेटे की बात कि 'बाबा दस हजार रखा हूँ। पिछले साल की फसल की कमाई । इस साल अगर फसल अच्छ हुई तो दो पक्के कमरे बनवा लेंगे। बल्ब लगवा लेंगे तो बच्चों की पढ़ाई में आराम हो जायेगा। मैं पढ़ाऊँगा उन्हें।' भागो भागो बांध टूट गया है।। पानी हमारे गांव तक जा गया है, सुनकर सुखरू का बेटा पेटी से दस हजार निकाल कर, उसके साल भर के पसीने की कमाई, पेट में गमछे से बांध कर भाग गया। सुखरू को घर का मोह जो था, वह छानही में चढ़ गया। बेटे के पीछे सभी चले गये, पर पानी तो मौत बनकर उनके पीछे आ गयी और सबकुछ बहाकर ले गई। अपनी आँखों से बेटे-बहु, नाती को बहते

 देखता रहा। इससे भी बुरा हाल चंदू का था, जो भैस चराने गया था और

एक फीट की दरार देखा और दहशत में आ गया। उसने किसी साइकिल वाले से गाँव वाले को चेतावनी देने कहा।उसके जाते ही वह बांध के किनारे एक पेर पर चढ़ गया।उसी समय बांध ग्यारह मीटर चौड़ाई से फूट गया।और पानी अपने साथ मिट्टी बहा ले गई और कई मीलों तक खेतोंं मे फैल गई।चंदू की सारी भैंसे उस पानी में बह गई।


चंदू ही अकेला इंसान था, जिसने पेड़ पर बैठकर इसे जल प्लावन की विनाश तो देखी थी। दो भरे पेड़ पर बैठे पानी की तेज आवाका सुन्न हो गये थे। आँखें पथरा गयी थी। पानी की आवाज बंद होने पर उसने देखा कि खड़पड़िया बांध खाली हो चुका था। वहां सिर्फ कीचड़ ही बचा था और उसके सामने चारों तरफ पानी ही पानी था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह कहाँ जाए। उसका गाँव बह चुका था। सभी भैंसे मरी पड़ी थी। नीचे उतरकर धोरे धीरे वह अपने उजड़े गाँव की ओर गया जहाँ कोई नहीं था। दोपहर तक वह चलता ही रहा और सुखरू के गाँव में आकर बैठ गया।


पुलिस और अन्य मददगार चंदू से उसका पता पूछने पर वह चुप बैठा रहता। कुछ लोगों की रोने की आवाज सुनकर वह चिल्ला उठता 'भागो भागो बांध फूट गया।' या पेड़ पर चढ़ जाता। लोग उसे उतारते और प्यार से समझाते पर वह नहीं समझता और दौड़ने लगता। सुखरू को अपने छानही में बैठे देखता तो वहाँ चढ़ जाता और कहता 'भाई नीचे मत उतरना। बांध का पानी इधर आने वाला है। तुम डूब जाओगे।' चंदू की बातें सुनकर सुखरू जैसे सोते से जाग उठता। उसे अपना बेटा याद आ जाता। बंहू भी तो उसके बेटे की उम्र का था। शायद यह मुझसे भी दुखी है ऐसा सोच सुखरू उसे गले से लगा लेता। चंदू भी जोर से रोने लगता। प्यार और अपनापन मिलते ही उसे सब याद आने लगता। वह चिल्ला उठता- बाबा। बाबा ।। मेरे सामने सब बह गया। मैंने पेड़ पर सारे गांव को बहते देखा। क्यों हुआ यह इस जीवनदायनी बांध के जल जिसे हम पूजते हैं। उसने इतना विनाश क्यों किया? हमसे क्या गलती गयी कि उसने इतना तांडव मचाया?


 सुखरू, चंदू को गले से लगाता है उसकी आँखों में आंसू आ जाते है। वह उसके सिर पर हाथ फेरकर कहता है 'बेटा गलती तो हमसे जरूर हुई है। जल, अग्नि का कोप तो हमारी गलती से ही होता है। एक बच्चे को पालने में हम जिस तरफ उसे छूट देते हैं। वह उसी तरफ बढ़ता है। वैसे ही जल को बांधने में हमसे गलती हो गई। एकड़ जहाँ कमजोर थी वहीं से टूट गया तब उसे कैसे रोकें? उसकी दिशा ही बदल गई। गलती तो हमारी ही है। उसे देखना हम सबकी जिम्मेदारी थी। जल ने जीवन दिया। वही हमारा पालनहार है। उसे संभालना हमारा कर्तव्य है और हम अपने कर्तव्य से चूक गये। उसी की यह सजा है। जल का कोप सही है। उसी ने हमें यह सजा दी। हमने उसकी सही परवरिश नहीं उसकी रक्षा नहीं की, सही दिशा नहीं दी, तो उसने अपना कोप दिखा दिया। आओ चले। तुम मेरे साथ रहना !! हम अपना घर एक बार बनाएँगे जहाँ प्यार होगा।


चारो तरफ गाँव के लोग खड़े थे। शाम होने वाली थी। एक छोटी सी बच्ची पत्तल में चाँवल  लेकर आई और बोली --  बाबा तुमने दो दिन से नहीं खाया है। ये लो खाना । मामा तुम खाना खाओगे? चंदू उठकर उस बच्ची को पुचकारता है और कहता है- 'बेटा मैं भी दो दिन से नहीं खाया हूँ। आओ ! हम सब खायेंगे।' सुखरू कहता है चलो। तुम्हारी माँ के पास चलते हैं ! क्या नाम है तुम्हारा?' रजिया !! कहकर वो दोनों हाथ ऊपर करके कहती है- 'मेरे अब्बा तो ऊपर चले गये। मैं स्कूल में रहती हैं। वहाँ बहुत सारे मामा मुझे खाना देते हैं।' सुखरू और चंदू उसे गोद में लेकर प्यार करते है। सुखरू कहता है- 'देखो ! मैं तुम्हारा दादा और चंदू कहता है- 'मैं तुम्हारा मामा। रजिया खुश हो जाती है और कहती है- 'चलों ! अब हम लोग नया घर बनायेंगे। जल ने कोप क्यों दिखाया इसका उत्तर मुझे मिल गया।'

दो दिन के उथल- पुथल पर विराम लग चुका था। यह कोप सही था। उसने एकता और प्यार का सबक दिया जिसे हम भूल चुके थे। जल ही जीवन है। इसी जल ने इतनी विनाश लीला के बाद फिर से नया जीवन दिया।


सुधा वर्मा 

13 अगस्त 2010 दैनिक भाष्कर में प्रकाशित


जीवन परिचय

जन्म 23/11/55, जगदलपुर

शिक्षा: एम एस सी, बी एड

देशबंधु के साप्ताहिक छत्तीसगढ़ी अंक "मड़ई" की संपादक।


22 हिंदी और छत्तीसगढ़ी पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। दो छत्तीसगढ़ी उपन्यास है। संपादकीय की तीन पुस्तकें तरिया के आंसू, परिया धरती के सिंगार, बरवट  के गोठ, कई छत्तीसगढ़ी नाटक के अलावा " दुलारी" टेली फिल्म छप चुकी है। प्रौढ़ शिक्षा, के लिये राज्य संसाधन केंद्र रायपुर से दो पुस्तक लोक कथा" चुरकी भुरकी" और गोदना के गोठ का प्रकाशन हुआ है। एन बी टी से भी अरुण की गाय प्रकाशित हुई है। पाठ्य पुस्तक निगम ने डा. खूबचंद बघेल की चित्रकथा प्रकाशित की है। छत्तीसगढ़ी भाषा के संरक्षण और संवर्धन के लिये मुख्यमंत्री द्वारा उनके निवास स्थान पर सम्मानित।

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