आज का दिन उत्पादन कार्यों से जुड़े श्रमवीरों को समर्पित है।
विगत कुछ वर्षों से आज के दिन छत्तीसगढ़ में सर्वाधिक लोकप्रिय खाद्य "बासी" का घनघोर प्रचार हुआ है और अनेक बड़े बड़े उत्साही लोग चम्मच से बासी खाते दिखे हैं। छत्तीसगढ़ के विभिन्न अंचलों में विविध खाद्यान्नों से बने भोजन के नाम को लेकर भ्रम है। सामान्यतः रात्रि में बचे चावल, कोदो, कुटकी इत्यादि से बने भोजन को पानी में डूबा देते हैं और उसे दूसरे दिन खाते हैं, इसे बासी कहते हैं। प्रातः बने चावल के भात को पानी में डुबाकर कुछ घंटे बाद खाते हैं तब इसे "बोरे या पखाल" कहते हैं। चावल, कोदो, कुटकी, मडिया इत्यादि को अधिक पानी मिलाकर तरल खाद्य बनाते हैं तब उसे पेज कहते हैं । ये सभी खाद्य पदार्थ घर से दूर जाकर खेत या वन में काम करने वालों के लिए सुविधाजनक है क्योंकि इसे नमक, मिर्च की चटनी या आचार के साथ खाया जाता है।
अंग्रेज अधिकारी नेल्सन ने रायपुर डिस्ट्रिक्ट गजेटियर में भी बासी का उल्लेख करते हुए लिखा है कि एक बार भगवान शिव धरती में अन्न बांटने आए थे और छत्तीसगढ़िया विलंब से पहुंचा था। तब तक अन्न के कुछ दाने ही बचे थे।
छत्तीसगढ़िया उन दानों को लेकर पानी में भिगो दिया जिससे दाने पानी सोख कर आकर बढ़ा लिए थे, जिसे उसने खा लिया। नेल्सन ने इस प्रसंग में "छत्तीसगढ़िया ऑलवेज लेट" लिखकर व्यंग भी किया है ।
मैं आज के दिन को केवल मजदूरों तक सीमित न रखकर उत्पादन कार्यों से जुड़े सभी श्रम वीरों को समर्पित करता हूं। साथ ही यह भी ध्यानाकर्षण करना चाहता हूं कि कुछ जानकारों के अनुसार शारीरिक परिश्रम नहीं करने वालों द्वारा "बासी और उसके पसिया" के निरंतर सेवन से शुगर लेवल बढ़ता है इसलिए बासी -पसिया का सेवन करने वाले शारीरिक परिश्रम भी करें !
प्रो. घनाराम साहू रायपुर छग
Ghanshyam Prasad Sahu
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