June 08, 2024   gpsahu



शिक्षक / साहित्यकार श्रवण कुमार साहू "प्रखर" की समसामायिक कविताएं

शिक्षकीय कार्य के साथ साथ साहित्य लेखन और मानस गायन करते हैं प्रखर जी


1.जागे रुखवा ल बचाय ल पड़ही---

पेड़ लगावव,पेड़ लगावव।

            सब झन नारा लगावत हे।

एक पेड़ के पाछु म देखव, 

       दसो झन सेल्फी खिचावत हे।।


वाट्सअप अऊ फेसबुक म, 

             जम्मो फोटू ल बगरावत हे।

बड़े -बड़े समाचार पत्र म, 

               समाचार ल छपवावत हे ।।


फेर पानी, खातू कोनो नी देवय, 

               कोनों ह नी तो देवय कोड़ा।

मारे गरमी म पौधा अईलागे, 

           वोकर तन बदन म होगे फोड़ा ।।


दु दिन के बाद म तै देख ले, 

                 वोला छेरी पठरू खावत हे।

हमला का करना हे कहिके, 

                मनखे मन ह इतरावत हे ।। 


पौधा लगाय ले कछु नी होय,

         जागे रुखवा ल बचाय ल पड़ही।

बेरा राहत कोनो नी चेतेन त,

      नंगत दुख पीरा ल खाय ल पड़ही ।।


2. मरेच म भलाई हे----

जिंयत भर ले दुख पीरा,

अऊ नंगत के तन्हाई हे।

दुनिया भर के कांय कचर,

जिनगी भर झगरा लड़ाई हे।।

कभु -कभु तो मेंहा सोचथों,

साले ल मरेच म भलाई हे---


पढ़ईया ल पढ़ाई लिखाई,

व्यापारी ल व्यापार के।

रिटायर मनखे ल पेंशन के,

त कर्मचारी ल सरकार के ।।

किसान मन ल खेत -खार,

अऊ खातु कचरा दवाई हे--


गृहस्थी ह नाना जंजाल,

छट्ठी बरसी अऊ शादी हे।

बर बिहाव होगे ताहन ले,

बाढ़त देख आबादी हे ।।

एक डहर दाई के मया त,

दुसर मनमोहिनी बाई हे--


जिंयत मनखे के चारी चुगरी,

दुनिया कहिथे वोला शैतान ।

मरे के पाछु इही मनखे ल,

काहत हावय जी भगवान ।।

जिंयत भले दाना बर तरसे,

मरे पाछु म पितर पहुनाई हे--


जिंयत भर रपोटो- रपोटो, 

रुपिया पैसा अऊ बंगला ।

ये काया ले जीव ह छुटगे, 

होगेस कंगला के कंगला ।।

दुनिया भर के काम क्रोध, 

 ओह्हो भारी के रिस राई हे--


फेर सोचथों ये मानुष तन ह, 

अऊ दुबारा कहाँ ले आही ।

कुकुर बिलई, हाथी घोड़ा ह, 

का मनखे के सुख ल पाही ।।

परहित खातिर जिए मरे म, 

ये जिनगी के घात सुघराई हे---


3.संस्कारों की पृष्ठभूमि में नारी----


होलिका जब प्रह्लाद को लेकर, 

           उस जलती चिता में बैठी थी ।

अहंकार की ज्वाला में देखो, 

             खुद ही जल -जल येंठी थी ।।


शूर्पनखा ने श्रीराम लखन को, 

         मानों अकारण ही रिझाया था ।

काम वासना में जलने का फल, 

           श्री लखन लाल से पाया था ।।


पुतना भी तो नारी ही थी जिसने, 

         कान्हा को विषपान कराया था ।

नारी धर्म को जिसने शर्मिंदा किया, 

   जिसे श्रीकृष्ण ने यमपुर पठाया था ।।


माता कयाधु धन्य धन्य हो, 

     प्रह्लाद को नृसिंह से मिलाया था ।

रामबोला को उस रत्नावली ने, 

      गोस्वामी तुलसीदास बनाया था ।।


केकसी भी तो नारी थी जिसने, 

             स्वार्थ भरी वो कृत्य किया ।

महाज्ञानी उस रावण ने फिर, 

            शैतान बनकर जीवन जिया ।।


कौशिल्या भी एक नारी थी, 

        जिसने राम को ईश्वर बना दिया ।

पुत्र के रूप में पाया था जिसे, 

         जग का जगदीश्वर बना दिया ।।


आँख में पट्टी बाँधकर गांधारी 

            जब दुर्योधन के लिए रोती है ।

रामायण के इस आर्यावर्त में, 

              तब -तब महाभारत होती है ।।


संस्कारों की पृष्ठभूमि में, 

              एक नारी ही केंद्र में होती है ।

नर को नारायण बनाने हेतु, 

               दिव्य बीज मंत्र वो बोती है ।।


         -:रचनाकार:-

श्रवण कुमार साहू "प्रखर"

शिक्षक / साहित्यकार

राजिम, जिला गरियाबंद छग

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