1.जागे रुखवा ल बचाय ल पड़ही---
पेड़ लगावव,पेड़ लगावव।
सब झन नारा लगावत हे।
एक पेड़ के पाछु म देखव,
दसो झन सेल्फी खिचावत हे।।
वाट्सअप अऊ फेसबुक म,
जम्मो फोटू ल बगरावत हे।
बड़े -बड़े समाचार पत्र म,
समाचार ल छपवावत हे ।।
फेर पानी, खातू कोनो नी देवय,
कोनों ह नी तो देवय कोड़ा।
मारे गरमी म पौधा अईलागे,
वोकर तन बदन म होगे फोड़ा ।।
दु दिन के बाद म तै देख ले,
वोला छेरी पठरू खावत हे।
हमला का करना हे कहिके,
मनखे मन ह इतरावत हे ।।
पौधा लगाय ले कछु नी होय,
जागे रुखवा ल बचाय ल पड़ही।
बेरा राहत कोनो नी चेतेन त,
नंगत दुख पीरा ल खाय ल पड़ही ।।
2. मरेच म भलाई हे----
जिंयत भर ले दुख पीरा,
अऊ नंगत के तन्हाई हे।
दुनिया भर के कांय कचर,
जिनगी भर झगरा लड़ाई हे।।
कभु -कभु तो मेंहा सोचथों,
साले ल मरेच म भलाई हे---
पढ़ईया ल पढ़ाई लिखाई,
व्यापारी ल व्यापार के।
रिटायर मनखे ल पेंशन के,
त कर्मचारी ल सरकार के ।।
किसान मन ल खेत -खार,
अऊ खातु कचरा दवाई हे--
गृहस्थी ह नाना जंजाल,
छट्ठी बरसी अऊ शादी हे।
बर बिहाव होगे ताहन ले,
बाढ़त देख आबादी हे ।।
एक डहर दाई के मया त,
दुसर मनमोहिनी बाई हे--
जिंयत मनखे के चारी चुगरी,
दुनिया कहिथे वोला शैतान ।
मरे के पाछु इही मनखे ल,
काहत हावय जी भगवान ।।
जिंयत भले दाना बर तरसे,
मरे पाछु म पितर पहुनाई हे--
जिंयत भर रपोटो- रपोटो,
रुपिया पैसा अऊ बंगला ।
ये काया ले जीव ह छुटगे,
होगेस कंगला के कंगला ।।
दुनिया भर के काम क्रोध,
ओह्हो भारी के रिस राई हे--
फेर सोचथों ये मानुष तन ह,
अऊ दुबारा कहाँ ले आही ।
कुकुर बिलई, हाथी घोड़ा ह,
का मनखे के सुख ल पाही ।।
परहित खातिर जिए मरे म,
ये जिनगी के घात सुघराई हे---
3.संस्कारों की पृष्ठभूमि में नारी----
होलिका जब प्रह्लाद को लेकर,
उस जलती चिता में बैठी थी ।
अहंकार की ज्वाला में देखो,
खुद ही जल -जल येंठी थी ।।
शूर्पनखा ने श्रीराम लखन को,
मानों अकारण ही रिझाया था ।
काम वासना में जलने का फल,
श्री लखन लाल से पाया था ।।
पुतना भी तो नारी ही थी जिसने,
कान्हा को विषपान कराया था ।
नारी धर्म को जिसने शर्मिंदा किया,
जिसे श्रीकृष्ण ने यमपुर पठाया था ।।
माता कयाधु धन्य धन्य हो,
प्रह्लाद को नृसिंह से मिलाया था ।
रामबोला को उस रत्नावली ने,
गोस्वामी तुलसीदास बनाया था ।।
केकसी भी तो नारी थी जिसने,
स्वार्थ भरी वो कृत्य किया ।
महाज्ञानी उस रावण ने फिर,
शैतान बनकर जीवन जिया ।।
कौशिल्या भी एक नारी थी,
जिसने राम को ईश्वर बना दिया ।
पुत्र के रूप में पाया था जिसे,
जग का जगदीश्वर बना दिया ।।
आँख में पट्टी बाँधकर गांधारी
जब दुर्योधन के लिए रोती है ।
रामायण के इस आर्यावर्त में,
तब -तब महाभारत होती है ।।
संस्कारों की पृष्ठभूमि में,
एक नारी ही केंद्र में होती है ।
नर को नारायण बनाने हेतु,
दिव्य बीज मंत्र वो बोती है ।।
-:रचनाकार:-
श्रवण कुमार साहू "प्रखर"
शिक्षक / साहित्यकार
राजिम, जिला गरियाबंद छग
Ghanshyam Prasad Sahu
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