सृष्टि का आधार है मां गायत्री
हिंदू धर्म शास्त्रों में विशेष उल्लेख आता है कि सभी वेदों की उत्पत्ति, सभी देवों की उत्पत्ति एवं संपूर्ण विश्व ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति मां गायत्री के गर्भ से ही हुई है। इसलिए गायत्री माता को वेदमाता, देवमाता और विश्वमाता कहा जाता है। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि के दिन ब्रह्मा जी के आवाहन पर मानव मात्र के उद्धार के लिए मां गायत्री धरती पर सद्ज्ञान के रुप में अवतरित हुई थी, तब से ही इस दिन को गायत्री जंयती के रूप में मनाया जाता है।
सभी मंत्रों का राजा, 24 अक्षरों वाला गायत्री महामंत्र इस प्रकार है:
।। ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्यः धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात ।।
जिसका तात्पर्य है, उस प्राण स्वरूप, दुःख नाशक, सुख स्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पाप नाशक, देव स्वरूप परमात्मा को हम हृदय में धारण करें !
वह परमात्मा हमारी बुद्धियों को श्रेष्ठ मार्ग पर प्रेरित करे!
सदज्ञान और सदबुद्धि की दात्री है मां गायत्री
गायत्री साधना से मनवांछित फल की प्राप्ति होती है। 24 अक्षरों वाले इस वेद मंत्र में अद्वितीय शक्ति है। जो व्यक्ति नियमित ब्रह्ममुहूर्त में गायत्री मंत्र का जप, साधना, उपासना करता है मां गायत्री उसके सभी कष्ट हर लेते हैं। साथ साधक के भीतर देवत्व की स्थापना कर सदज्ञान और सदबुद्धि की वृद्धि करती है।
वेदों ने किया मां गायत्री का यशगान
अथर्ववेद में कहा गया है; ॐ स्तुतामया वरदा वेदमाता प्रचोद्यांताम पावमानी द्विजानाम ! आयुः प्राणम प्रजाम पशु कीर्तिम ब्रह्मवर्चसाम मह्यम दत्वा ब्रजत ब्रह्मलोकम !!
अर्थात "मेरे (वेदों) द्वारा स्तुति की गई गायत्री अपने साधकों को आयु, प्राण, प्रजा, पशु, कीर्ति, धन एवं ब्रह्मवर्चस आदि प्रदान करे!" जो भी मनुष्य विधिपूर्वक श्रद्धा, विश्वास और पूर्ण पवित्रता के साथ गायत्री उपासना करते हैं मां गायत्री उनके ऊपर एक रक्षा कवच का निर्माण कर विपत्तियों के समय उसकी रक्षा करते हुए, अंत में साधक को ब्रह्मलोक यानी कि अपनी शरण में ले लेती है।
मां गायत्री की महिमा अपरम्पार है
महामंत्र जितने जग माही। कोऊ गायत्री सम नाही ।।
अर्थात- अन्य सभी मंत्रों की उत्पत्ति भी गायत्री के गर्भ से ही हुई है इसलिए मां गायत्री को वेदमाता और गायत्री मंत्र को सभी मंत्रों का राजा एवं गुरू मंत्र कहा गया है।
गायत्री मंत्र की साधना से ऋषि विश्वामित्र ने नई श्रृष्टि की रचना कर दी थी
वेदों में तो यहां तक कहा गया है कि गायत्री मंत्र की साधना करने से सभी मंत्रों के जपने का लाभ स्वतः ही मिल जाता है, ब्रह्मर्षि विश्वामित्र जी को गायत्री का प्रथम ऋषि कहा जाता है जिन्होंने गायत्री मंत्र की साधना के बल पर दूसरी सृष्टि का निर्माण किया था।
गायत्री महामन्त्र भारतीय तत्त्वज्ञान एवं अध्यात्मविद्या का मूलभूत आधार है। वट वृक्ष की समस्त विशालता उसके नन्हे से बीज में जिस प्रकार सन्निहित रहती है, उसी प्रकार के के वेदों में जिए अविच्छिन्न ज्ञान- विज्ञान का विशद वर्णन है, बीज- रूप से गायत्री मन्त्र में पाया जा सकता है।
गायत्री अनादि है अनंत है
भारतीय धर्म में प्रचलित उपासना- पद्धतियों में सर्वोत्तम गायत्री ही है। उसे अनादि माना गया है। देवता, ऋषि, मनीषी उसका अवलम्बन लेकर आत्मिक प्रगति के पथ पर आगे बढ़े हैं और इसी आधार पर उन्होंने समृद्धियाँ, सिद्धियाँ एवं विभूतियाँ उपलब्ध की हैं। हमारा प्राचीन इतिहास बड़ा गौरवपूर्ण है। इस गौरव- गरिमा का श्रेय हमारे पूर्व पुरुषों द्वारा उपार्जित आत्म- शक्ति को ही है। कहना न होगा कि इस दिव्य उपार्जन में गायत्री महामन्त्र का ही सर्वोत्तम स्थान है।
पुराणों में गायत्री महाशक्ति का निरूपण ब्रह्माजी की पत्नी के रूप में हुआ। ब्रह्म अर्थात् ब्रह्म- पत्नी, अर्धांगिनी, अर्थात् क्षमता। पौराणिक उपाख्यान के अनुसार अलंकार यह है कि ब्रह्माजी की दो पत्नी थीं, एक गायत्री दूसरी सावित्री। गायत्री अर्थात् चेतन जगत् में काम करने वाली शक्ति। सावित्री अर्थात् भौतिक जगत् को संचालित करने वाली शक्ति। भौतिक विज्ञान सावित्री की उपासना कर विधान प्रस्तुत करता है। विभिन्न प्रकार के वैज्ञानिक आविष्कार एवं उपकरण सावित्री शक्ति की अनुकम्पा के ही प्रतीक हैं। गायत्री वह शक्ति है जो प्राणियों के भीतर विभिन्न प्रकार की प्रतिभाओं, विशेषताओं और महत्ताओं के रूप में परिलक्षित होती है। जो इस शक्ति के उपयोग का विधान- विज्ञान ठीक तरह जानता है वह उससे वैसा ही लाभ उठाता है जैसा कि भौतिक जगत् के वैज्ञानिक अपनी प्रयोगशालाओं, मशीनों तथा कारखानों के माध्यम से उपार्जित करते हैं।
भारतीय तत्त्वदर्शियों ने इस ब्रह्म- चेतना की सत्ता चिर अतीत में ही जान ली और उस शक्ति के मानव- जीवन में उपयोग करने की प्रक्रिया का एक व्यवस्थित विधान बनाकर मानव- प्राणी के नगण्य अस्तित्व को इतनी महत्तम स्थिति में परिणत किया था, जिससे स्वयं तक ब्रह्मभूत हो सकें। इस विज्ञान का नाम "अध्यात्म" रखा गया। अगण्य दृष्टिगोचर होने वाला अणु आत्मा जिस प्रक्रिया का अवलम्बन करने से विभु बन सके, नर से नारायण के रूप में विकसित हो सके- परम आत्मा, परमात्मा बन सके, उस विद्या का नाम अध्यात्म अथवा ब्रह्म विद्या रखा गया। ब्रह्म अपने आप में दृष्टा मात्र है। वह ऐसा है तो सही पर अपनी महत्ता एवं गरिमा के अनुरूप उत्पादन एवं व्यवस्था की प्रक्रिया का भी निर्धारण करता है। उसकी सक्रियता- शक्ति यद्यपि उसी का अङ्ग है तो भी उसकी क्रिया प्रणाली की भिन्नता देखते हुए उसे ब्रह्म की पूरक सामर्थ्य भी कहा जा सकता है।
गायत्री का सबसे बड़ा जो गुण है, जिसके ऊपर गायत्री शब्द ही रखा गया है- ''गय''। गायत्री किसे कहते हैं?' गय '' कहते हैं प्राण को संस्कृत में। प्राण को मजबूत बनाने वाली, प्राण को ताकत देने वाली, प्राण का त्राण करने वाले को गायत्री कहते हैं। प्राण किसे कहते हैं? प्राण कहते हैं, हिम्मत को, प्राण कहते हैं, जीवट को और प्राण कहते हैं, साहस को। दुनिया में जितने भी उन्नतिशील लोग हुए हैं, सब आदमियों के पास और कोई गुण रहा हो, चाहे नहीं रहा हो, विद्या रही हो, चाहे नहीं रही हो, शारीरिक बल रहा हो, चाहे नहीं रहा हो, पर एक चीज जरूर रही है- अच्छे कामों के लिए साहस। गायत्री माता अपने साधकों को प्राणवान बनाती है !
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य शांतिकुंज हरिद्वार
Ghanshyam Prasad Sahu
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