आज उस महान कवि और ब्रह्म विचारक का पुण्य स्मरण करने का दिन है, जिन्होंने लगभग 600 वर्ष पूर्व जन्म से ही भेदभाव की पीड़ा से कराहती मनुष्यता के स्वर को देशज भाषा में मुखरित किया था।
संत कबीर के शब्द 6 शताब्दी बीत जाने के बाद भी प्रासंगिक बने हुए हैं। सचमुच वे आधुनिक काल के महान कवि और स्वतंत्र विचारक थे जिनके एक एक शब्द मनुष्य को झंझोड़ते हुए जीवन के सभी आयामों को भीतर से छूते हुए गुजर जाता है।
वे नर -नारी, प्रेमी -प्रेमिका, भक्त -भगवान, गुरु -शिष्य जैसे मानवीय संबंधों को विविध रूपों में प्रस्तुत करने में सफल रहे हैं तथा आधुनिक भारत के वास्तविक स्वप्न दृष्टा थे।
भगति देहुली राम की, नहिं कायर का काम।
सीस उतारै हाथि करि, सो लेसी हरिनाम।।
मैं संत कबीर को प्रणाम करता हूं!
प्रो. घनाराम साहू रायपुर छग
छत्तीसगढ़ में हर साल संत कबीर का प्राकट्य दिवस समारोह बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है!
अजय अमृतांशु जी ने छत्तीसगढ़ी में संत कबीर की जीवनी पर प्रकाश डाला!
संत कबीर अउ छत्तीसगढ़: 22 जून कबीर जयंती विशेष
विश्व वंदनीय सद्गुरु कबीर के अवतरण विक्रम संवत १४५५ (सन १३९८ ई ) के काशी (वाराणसी) मा माने जाथे। कबीरदास जी के नाम निर्गुन भक्तिधारा के कवि मा सबले ऊँचा माने जाथे,उन हिंदी साहित्य के महिमामण्डित कवि आय। कबीर दास जी जतका बात कहिन सब अकाट्य हे वोला मानेच ल परही, काबर कबीर हमेंशा यथार्थ के बात कहिन। कोरी कल्पना या सुने सुनाये बात उँकर साहित्य म कोनो मेर नइ मिलय।
छत्तीसगढ़ के संदर्भ मा जब हम कबीर के बात करथन तब धनी धर्मदास के नाम सबले पहिली आथे। वइसे तो कबीर के सैकड़ों शिष्य होइन जेमन अपन अपन हिसाब से कबीर के विचारधारा के प्रचार प्रसार करिन फेर धर्मदास के नाम छत्तीसगढ़ के संदर्भ मा सबले जादा मायने रखथे। माने जाथे कि धर्मदास जी वैष्णव सम्प्रदाय के रहिंन परन्तु जब उँकर मुलाकात संत कबीर से होइस तब कबीर के उपदेश ले उन बहुत जादा प्रभावित होइन अउ कबीर के शरण मा आगिन। तदुपरांत धर्मदास अपन सारा संपत्ति (तब लगभग 64 करोड़) ल कबीर पंथ के विस्तार खातिर लगा दिन। कबीर पंथ म ये मान्यता हवय कि धनी धर्मदास के द्वितीय पुत्र मुक्तामणिनाम ल संत कबीर अटल 42 वंश होय के आशीर्वाद दे रहिन जेकर कारण प्रथम वंश गुरु के रूप मा पंथ श्री मुक्तामणिनाम साहब कुदुरमाल म सुशोभित होइन अउ छत्तीसगढ़ मा कबीर पंथ के विस्तार होय लगिन।
वंश गुरु मन धर्मदास के वंशज रहिन अउ अपन अपन कार्यकाल मा के कबीर पंथ के खूब प्रचार प्रसार छत्तीसगढ़ मा करिन। छत्तीसगढ़ के कुदुरमाल, रतनपुर, धमधा, कवर्धा अउ दामाखेड़ा कबीर पंथ के प्रमुख केन्द्र बनिस ।
निःसंदेह छत्तीसगढ़ मा कबीरपंथ के सबले जादा अनुयायी दामाखेड़ा गद्दी से जुड़े हवय। इहाँ के अधिकांश आश्रम दामाखेड़ा ले ही सम्बद्ध हवय परन्तु फिर भी दामाखेड़ा ले इतर भी कई कबीर आश्रम के निर्माण होइस अउ कबीर के ज्ञान के खूब प्रचार छत्तीसगढ़ मा होइस। गला मा कंठी, माथा म सफेद तिलक अउ श्वेत वस्त्रधारी साधु, संत,महंत साध्वी मन कबीर के विचार ला सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ मा फैलाइन।
कबीर पंथ मा वंश परंपरा के अनुसार प्रथम पुत्र वंश गद्दी के हकदार होथे अउ बाकी पुत्र ल गुरु गोसाई के दर्जा मिलथे। गुरु गोसाई मन ला चौका आरती करें के पूरा अधिकार होथे। वंश विस्तार के सँग गुरु गोसाई मन घलो कबीर पंथ के विस्तार खातिर जघा-जघा कबीर आश्रम बनाइन अउ पंथ के विधान के अनुसार चौका आरती करिन अउ आजौ करत हवय। दामाखेड़ा मा वंशगुरू दयानाम साहेब के जब कोई संतान नइ होइस तब दयानाम साहेब के सतलोक गमन के बाद गुरुमाता कलाप देवी ह गृन्धमुनि नाम साहेब ल गोद लिन जो कि गुरु गोसाई के सुपुत्र अर्थात वंशज ही रहिन। लेकिन तत्कालीन कबीरपंथी समाज,कुछ साधु महंत मन येकर विरोध करिन अउ नाराज होके काशीदास जी ल गृन्धमुनि नाम निरूपित करके खरसिया मा गुरु गद्दी बना के बइठार दिन। तब से ले के आज पर्यन्त खरसिया मा भी वंश परंपरा चले आते हे। लेकिन खरसिया के गद्दी मा जो भी वंश गुरु विराजमान होथे वो योग्यता के अनुसार होथे न कि दामखेड़ा सरिक वंश कुल मा जन्म के अनुसार। वर्तमान में अर्धनाम साहब खरसिया गद्दी मा हवय। ये गद्दी मा विराजमान वंशगुरु निहंग होथे येमन धर्मदासी नादवंश कहे जाथे। खरसिया गद्दी से उदितमुनी नाम साहेब काशी म भव्य सतगुरु कबीर प्राकट्य धाम के निर्माण करे हवय अउ कबीर पंथ के प्रचार छत्तीसगढ़ ले बाहिर घलो करत हवय जे हमर बर गरब के बात हवय। ग्राम -नादिया (राजनाँदगाँव / दुर्ग) मा घलो कबीर आश्रम के स्थापना कर उत्तराधिकारी मन प्रचार प्रसार करत हवय।
छत्तीसगढ़ म बीजक अउ पारख सिद्धांत
मूलतः बीजक ही कबीर के सर्वमान्य ग्रंथ माने गे हवय जेमा निहित कबीर के वाणी (मूलतः साखी, सबद, रमैनी) संग्रहित हवय। कबीर के शिष्य मा अनेक संत हवय जेन 42 बंश के मान्यता ला एक सिरा से खारिज करथे। इमन बीजक मा वर्णित बात ला ही मानथे अउ बीजक के प्रचार प्रसार करथे। येकर मानने वाला संत मन पारखी संत कहे जाथे। चौका आरती के परंपरा पारख सिद्धांत मा कहीं नइ हे। पारख मा चरण बन्दग़ी के मनाही हवय बंदगी दूर से ही करे जाथे। पारखी संत परंपरा मा अभिलाष दास जी प्रकाण्ड विद्वान होइन। लगभग 80 किताब के रचना उन करिन। महासमुंद, राजिम आदि जघा मा पारखी संत के कबीर आश्रम बने हवय जिहाँ कबीर साहित्य के अध्ययन के सुविधा हवय।
अभिलाष दास जी कबीर के संदेश के प्रचार प्रसार खातिर इलाहाबाद में भव्य कबीर आश्रम बनाइन जिहाँ अध्ययन अउ अध्यापन दूनो के व्यवस्था हवय। अभिलाष दास जी मन छत्तीसगढ़ के पोटियाडीह में भी कबीर आश्रम के स्थापना करिन जिहाँ केवल साध्वी महिला मन ही रहिथे अउ कबीर के उपदेश के प्रचार करथें।
संत असंग साहेब (खीरी, उ.प्र) घलो छत्तीसगढ़ आइन अउ ग्राम -सरखोर मा नदी किनारे कबीर आश्रम बना के आज पर्यन्त कबीर वाणी के प्रचार प्रसार करत हवँय। इँकर अनुयायी काफी संख्या मा हवय।
कबीर पंथ अउ चौका आरती
संत कबीर निर्गुण ब्रम्ह के उपासना म जोर दिन अउ निर्गुण पंथ के स्थापना करिन। निर्गुण भक्तिधारा के उन प्रंथम कवि रहिन। चौका आरती के संबंध म अलग अलग विद्वान मन के अलग अलग मान्यता हवय। कुछ के मतानुसार तात्कालीन समय म हिन्दू समाज मे बलि प्रथा चरम मा रहिस।
कबीर के विचारधारा ले जब मनखे मन प्रभावित होके कबीर पंथ अपनाये लगिन तब उँकर मन ले बलि प्रथा ल हटाये खातिर चौका आरती के विधान शुरु करे गिस, जेमा बलि के जगह नारियल के आहुति दे गिस।
जो भी हो चौका आरती के परंपरा छत्तीसगढ़ मा सैकड़ो साल ले चले आवत हे अउ हजारों महंत वंशगुरु ले पंजा ले के चौका आरती अउ कबीर पंथ के प्रचार करत हवय।
उलटबासी अउ कबीर
उलटबासी मा कबीर ल महारत हासिल रहिस। दुनिया मा सबले जादा उलटबासी संत कबीर ही लिखे हवय। उलटबासी पढ़े अउ सुने म तो उटपटांग अउ निर्थक लागथे फेर जब गहराई मा जाबे तब येकर गूढ़ अर्थ समझ आथे। पंडित मन के अहंकार ल टोरे खातिर ही कबीर उलटबासी लिखिन जेकर अर्थ ल बड़े बड़े पंडित मन घलो बूझ नइ पात रहिन। कबीर अउ गुरु गोरखनाथ समकालीन रहिन। गोरखनाथ के अहंकार ल कबीरदास जी टोरिन अउ अंत मा गुरु गोरखनाथ ला हार माने ल परिस। छत्तीसग़ढ़ी के वरिष्ठ गीतकार श्री सीताराम साहू "श्याम " द्वारा रचित ये कालजयी गीत ल आप सबे जानत हव जेन कबीर के उलटबासी ऊपर आधारित हवय -
बूझो बूझो गोरखनाथ अमरित बानी !
बरसे कमरा फीजे ल पानी जी !!
ये गीत के लोकप्रियता ये बताथे कि कबीर के सन्देश छत्तीसगढ़िया जनमानस मा कतका लोकप्रिय हवय। न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि सम्पूर्ण भारतवर्ष के कबीरपंथी समुदाय मा भगवान ले पहिली दर्जा गुरु ल दे गए हवय।
संत कबीर लिखथें.....
कबीरा ते नर अँध है, गुरु को कहते और।
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर ॥
छत्तीसगढ़ मा चौका आरती के उपरांत गुरु बनाए के परंपरा हवय। कान फूंका के कंठी माला धारण करे जाथे, संगे संग शुद्ध सात्विकता के पालन करे के वचन गुरु ल दे जाथे। गुरु बनाये के सुग्घर परम्परा आज भी हमर इँहा प्रचलित हवय। दुख अउ दुःख के समस्त काम गुरु के द्वारा ही सम्पन्न कराये जाथे।
कबीर के अर्थ महान होथे। कबीर के संदेश हा दोहा, साखी, सबद, रमैनी अउ निर्गुणी भजन के रूप मा छत्तीसगढिया जन मानस म रचे बसे हे। छत्तीसगढ़ मा कबीर पंथ के अनुयायी लगभग 35 लाख हवय जेमा ज्यादातर पिछड़ा अउ शोषित वर्ग के हवय। अभी भी अभिजात्य वर्ग में कबीर के उपासक कम ही मिलथे। धर्मदास जी ला छत्तीसगढ़ी के पहिली कवि अउ उँकर पत्नी आमीन माता ल प्रथम कवियित्री माने गे हे। उँकर लिखे पद मन आज भी छत्तीसगढ़ मा श्रद्घा के साथ गाये जाथे। कबीर के अनुयायी मन में गजब के सहजता, सरलता अउ एक दूसर के प्रति सम्मान देखे बर मिलथे आडम्बर अउ कर्मकांड ले कोसों दूर कबीरपंथी मन उपर ये दोहा सटीक बइठथे-
चाह मिटी चिंता मिटी, मनुवा बेपरवाह।
जिसको कुछ ना चाहिए, वो ही शहंशाह।।
सद्गुरु कबीर युग प्रवर्तक रहिन। हिंदी साहित्य के 1200 बछर के इतिहास म कबीर जइसन न तो कोनो होइस अउ न अवइया बेरा म कोनो हो सकय। कबीर अद्वितीय रहिन ये बात सब ल स्वीकारे बर परही।
अजय अमृतांशु, भाटापारा छग मो. 9926160451
सत शोधक सत बोधक गुरुवर, आप सत्य अनुयायी।
मिथ्या मत पाखंड विरोधी, हो निष्पक्ष न्यायी।।
नीर क्षीर निर्णायक ना तुम सा कोई और।
गूंज रहा है नाम आपका चारों ओर।
संतों के सम्राट सद्गुरु बंदी छोड़।
गूंज रहा है नाम आपका चारों ओर।।
सभी देशवासियों को सद्गुरु कबीर जयंती की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं..!
गिरधर साहू रायपुर
(कबीर जयंती विशेष: कविता)
भेज कोनो बैसाखी
नई जानेव तोर पूजा कबीरा,
नई जानेव तोर साखी।
मन म कपटी कौंआ के बासा,
अऊ तन बगुला कस पाखी।।
तैतिस कोटि देवता के फेर म,
फकत पथरा म मुडी नवावत हों।
घर म बिराजे जेन देवी देवता,
वोला जिनगी भर तरसावत हों।।
काम, क्रोध के फेर म पड़के,
मोर जीते जिंयत मुंदागे आँखी--
गर म तुलसी के माला पहिरे,
माथ म चंदन टीका लगाए हों।
फेर ऊँच -नीच अऊ छुआछूत के,
दलदल म अभी ले बोजाये हों।।
हिरदे म अतका पाप भरे हे कि,
अब कोन ल बनावंव साखी--
अपन सुवारथ के खातिर,
बोकरा,भेड़ा ल मारत हों।
चारों धाम के तिरिथ बरथ,
करके पुरखा ल तारत हों।।
अइसन म भव सागर कैसे तरहि,
साहेब जी भेज कोनो बैसाखी---
रचनाकार:
श्रवण कुमार साहू "प्रखर"
शिक्षक/साहित्यकार
राजिम, गरियाबंद छग
मो. 9009540810
आप सब ला संत कबीरदास जयंती के अंतस ले बधाई शुभकामना !
मनीराम "मितान"
Ghanshyam Prasad Sahu
+91-79872 78335
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