July 08, 2024   gpsahu



जहां चरित्रवान व्यक्तित्व का निर्माण होता है, वह प्रयोगशाला परिवार ही है

धन से बड़ा हुआ जा सकता है किन्तु महानता तो चरित्र निर्माण से ही आती है..

"परिवार" एक प्रकार का छोटा सा राष्ट्र है। सुविस्तृत समाज का छोटा सा संस्करण है। "युग निर्माण" की क्षमता विकसित करने के लिए हमें "परिवार निर्माण" की पाठशाला में "प्रशिक्षण" प्राप्त करना चाहिए।" 

भोजन -वस्त्र की, शौक मौज की, शिक्षा सुविधा की व्यवस्था बनाए रहने से ही परिवार की आवश्यकता पूर्ण नहीं हो जाती, वरन उस छोटे क्षेत्र में ऐसा वातावरण बनाना पड़ता है जिसमें पलने वाले प्राणी हर दृष्टि से "समुन्नत -सुसंस्कृत" बन सकें। अधिक खरच करने, अधिक सुविधा साधन रहने से, नौकर -चाकरों की व्यवस्था रहने से घर साफ -सुथरा और सुसज्जित रह सकता है। संपन्नता के आधार पर बढ़िया भोजन -वस्त्र, ऐश -आराम, विनोद -मनोरंजन के साधन मिल सकते हैं। किंतु "व्यक्तित्व" को समग्र रूप से विकसित कर सकने वाले "सुसंस्कार" केवल उपयुक्त "वातावरण" में ही संभव हो सकते हैं। ऐसा "वातावरण" कहीं बना -बनाया नहीं मिलता, न कहीं खरीदा जा सकता है, उसे तो स्वयं ही बनाना पड़ता है।

प्राचीनकाल के गुरुकुलों की बात दूसरी थी, वहाँ "उत्कृष्टता" का "वातावरण" बना हुआ रहता था। घर-परिवार में जो कमी रहती थी; उसकी पूर्ति वहाँ हो जाती थी। ऋषि-तपस्वी अपने ज्ञान, कर्म और प्रभाव से विद्यार्थियों के "चरित्र निर्माण" की आवश्यकता पूरी किया करते थे। पर अब वैसे गुरुकुल, विद्यालय भी कहाँ हैं ?

"अब तो वह आवश्यकता प्रत्येक "सद्‌गृहस्थ" को स्वयं ही पूरी करनी पड़ेगी।" इसे यदि पूरा न किया गया, घर में "सुसंस्कृत वातावरण" न बनाया जा सका, परिष्कृत परंपराओं का प्रचलन न किया जा सका तो उस घर में रहने, पलने वाले लोग "भूत -वेताल" बनकर ही रहेंगे। स्वास्थ्य, शिक्षा, चतुरता की दृष्टि से वे कितने ही अच्छे क्यों न हों, "मानवी सद्‌गुणों" से वंचित ही रहेंगे। कोई कितना कमाता है, कितना बड़ा कहलाता है, यह बात अलग है और किसका "व्यक्तित्व" कितना "समुन्नत" है, यह प्रश्न बिलकुल अलग है।

"बड़ा आदमी" बनना "सरल" है, "श्रेष्ठ सज्जन" बनना "कठिन" है।" सुख- शांतिपूर्वक रहने और अपने साथियों को प्रसन्न -संतुष्ट रखने के लिए "बड़प्पन" की नहीं, "महानता" की आवश्यकता पड़ती है। उसी का उपार्जन मानव जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। कोई "परिवार" इस दिशा में जितना सफल होता है, उसकी उतनी ही "सार्थकता" मानी जा सकती है !

पं. श्रीराम  शर्मा आचार्य

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