विश्व के इतिहास मे 19 वीं सदी मे एक ऐसी अद्भुत घटना घटी, भारत माता की पवित्र आंचल मे एक अत्यंत प्रतिभाशाली बालक ने 12 जनवरी 1863 को जन्म लिया। जिसने न सिर्फ भारत के लोगों का बल्कि। समूची मानवता का गौरव बढ़ाया। उनके माता -पिता ने उस बालक का नाम नरेन्द्र रखा। बाद मे वही बालक अपने आध्यात्मिक विचार एवं सिद्धांत से ओत-प्रोत होकर स्वामी विवेकानंद के नाम विश्व विख्यात हुए। स्वामी विवेकानंद युरोपीय दर्शन के साथ विभिन्न विषयों के अध्ययन कर जानकारी प्राप्त कर बहु आयामी प्रतिभाशाली युवा के रूप मे उभरे। हिन्दू धर्म और सनातन धर्म संस्कृति का दुनिया भर में प्रचार प्रसार करने वाले वे भारतवर्ष के पहले संन्यासी थे। उन्होंने पश्चिमी देशों मे भ्रमण करके सनातन विचार, सिद्धांत, मूल्यों, हिन्दू धर्म एवं भारतीय संस्कृति की उत्कृष्टता का डंका बजाया। स्वामी जी का अपने गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस के संपर्क के पश्चात उनके जीवन दर्शन मे एक बड़ा परिवर्तन दिखाई दिया। श्री रामकृष्ण परमहंस के सानिध्य मे दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हुई और उनका आध्यात्मिक विचार, चिंतन मे अद्भुत विकास हुआ।
11 सितंबर 1893 को संयुक्त राज्य अमेरिका के शिकागो मे विश्व धर्म सम्मेलन आयोजित किया गया। वहां स्वामी विवेकानंद ने अपने भाषण का आरम्भ "मेरे अमेरिकी बहनों एवं भाईयों" कहकर किया। इन शब्दों ने उक्त धर्म सम्मेलन मे ऐसा जादू किया कि पूरा हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। इसके लिए स्वामी जी ने अमेरिकी वासियों को भारतीयों एवं धर्म भूमि की तरफ से कोटि कोटि धन्यवाद ज्ञापित किया।
स्वामीजी का अटूट विश्वास था कि सभी मार्ग एक सच्चे ईश्वर की ओर ले जाते हैं। जैसा कि ऋग्वेद मे भी कहा गया है "एकम सद्विप्रा बहुदा वदन्ति" अर्थात सत्य एक है, दार्शनिक इन्हें अनेक नामों से पुकारते हैं।
जब वे चार साल बाद अमेरिका और ब्रिटेन की यात्रा कर भारत लौटे, तो वे मातृभूमि को नमन कर पवित्र भूमि में लेटकर लोटपोट हुए। इससे पता चलता है कि स्वामी जी का अपने मातृभूमि के प्रति कितनी अपार श्रद्धा और प्रेम की दिवानगी थी। उन्होंने कहा कि मातृभूमि का कण -कण अत्यंत प्रेरणादायक और पावन पुनीत है इसलिए इनकी धुलि से सराबोर हूं। पश्चिमी सभ्यता भोग लालसा से भरपूर है जबकि आध्यात्मिक नैतिक मूल्य एवं लोक आचार विचार भारत के रग रग में समाया हुआ है।
स्वामी जी की आध्यात्मिकता, नैतिकता, विश्व कल्याण और एकता की भावना को संकेत करते हुए सुभाष चन्द्र बोस ने लिखा है -"स्वामी जी इसलिए महान है कि उन्होंने पूर्व -पश्चिम, धर्म और विज्ञान, अतीत और वर्तमान में सामंजस्य स्थापित किया है।" गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने एक बार कहा था, "यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानंद को पढ़िए। उनमें आप सब कुछ सकारात्मक ही पाएंगे, नकारात्मक कुछ भी नहीं।" रोमा रोला ने उनके बारे में कहा था, "उनके द्वितीय होने की कल्पना करना भी असम्भव है, वे जहां भी गए सर्वप्रथम ही रहे। हर कोई उनमें अपने नेता का दिग्दर्शन करता था। वे ईश्वर के प्रतिनिधि थे और सब पर प्रभुत्व प्राप्त कर लेना ही उनकी विशिष्टता थी।"
स्वामी विवेकानंद जी ने देश सेवा के लिए आह्वान करते हुए कहा कि मुझे केवल 100 युवा संन्यासी चाहिए, जो भारत के ग्रामों में फैलकर देशवासियों की सेवा मे खप जाएं। यद्यपि उनका यह सपना पूरा नहीं हो सका।
स्वामी विवेकानंद जी ने दुर्बलता पर जीत का मंत्र दिया। उनका मत था कि गीता को समझना हैं तो फुटबाल के खेल को समझना होगा, जिसमें हर समय जोश भरा हो तभी अर्जुन की तरह बन पाओगे!
गुलाम का कोई धर्म नहीं होता
एक बार सन 1901 हेमचंद्र घोष ने धर्म चर्चा चाही, तब भारत माता विदेशी हुकूमत की गुलामी से तड़प रही थी। स्वामी जी ने एक वाक्य में कहा कि "गुलाम का कोई धर्म नहीं होता। जाओ भारत माता को ब्रिटिश हुकूमत से स्वतंत्र कराओ!" यह बात उन्हें ऐसी लगी कि हेमचंद घोष प्रखर क्रांतिकारी के रूप उभर गए। एक बार खेतड़ी के महाराजा ने स्वामी जी के सम्मान में भजन नर्तकी को बुलाई।
नर्तकी ने की भजन -- प्रभू जी अवगुण चित न धरो।
"जो लोहा कसाई की कटार में है, वही मंदिर की कलश में"
"जल यमुना का हो या नाले का दोनों जब गंगा मे गिरते हैं, गंगा जल हो जाते हैं"
इन कीर्तन पंक्ति को सुनकर स्वामी जी के आंखों आंसू छलक पड़े। इस प्रकार उन्होंने एक नर्तकी से अद्वैत वेदांत की शिक्षा ली। इस घटना से छोटों से भी सीख लेने की प्रेरणा मिलती है।
स्वामी विवेकानंद ने युवाओं के लिए विशेष प्रेरक संदेश देते हुए कहा था कि "उठो, जागो और तब तक मत रुको, जब तक मंजिल प्राप्त न हो। स्वयं जागकर औरों को जगाओ। अपने नर जन्म को सफल करो।"
समाज को उन्होंने अनेक सिद्धांत दिए --
1. ज्ञान व्यक्ति के मन में ही मौजूद होता है और वह खुद ही सीखता है।
2. लडके और लड़कियों को समान शिक्षा मिलने का अधिकार होना चाहिए।
3. समाज के आध्यात्मिक और नैतिक विकास के लिए जन साधारण तक शिक्षा का प्रचार प्रसार होना चाहिए।
4. दरिद्रों की सेवा को ही सच्चे रुप मे ईश्वर की सेवा मानना चाहिए।
5. उन्होंने पुरोहितवाद, ब्राह्मणवाद, धार्मिक कर्मकाण्ड और रूढ़ियों की खिल्ली भी उड़ाई। उनकी दृष्टि में हिन्दू धर्म के सर्वश्रेष्ठ चिन्तकों के विचारों का निचोड़ पूरी दुनिया के लिए अब भी ईर्ष्या का विषय है।
6. शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य का निर्माण करना होना चाहिए। जिससे समाज और मानवता का दिग्दर्शन हो।
7. हम ओ हैं जो हमें हमारी सोच ने बनाया ।
8. जो चीजें आपको कमजोर बनाती हों, उसे जहर की तरह त्याग देना चाहिए।
9. जब तक आप स्वयं पर विश्वास नहीं करते, तब तक आप भगवान पर विश्वास नहीं कर सकते।
इन तरह से स्वामी विवेकानंद ने सामाजिक और सांस्कृतिक विकास के अनेक विचार और सिद्धांतों को युवाओं के समक्ष प्रस्तुत किया।
सच्चा मनुष्य कौन है -- स्वामी के अनुसार जो व्यक्ति जीवन मे सफल होने का सपना देखता है उसके भीतर सबसे पहला गुण आत्मविश्वास जरूर मौजूद होना चाहिए। जिस व्यक्ति मे आत्म विश्वास नहीं होता वह बलवान होकर भी कमजोर है जबकि आत्मविश्वास से भरा हुआ व्यक्ति कमजोर हो कर भी बलवान है।
आज हमारे देश के प्रधानमंत्री के नेतृत्व मे राष्ट्रीय शिक्षा नीति तैयार की गई जिसमें स्वामी विवेकानंद के वैज्ञानिक दृष्टिकोण, नैतिक मूल्यों और नए भारत के निर्माण की दृष्टि समाहित है। स्वामी जी का दर्शन और आदर्श भारतीय युवाओं के लिए प्रेरणा का बड़ा स्रोत है। वे महान विचारक, ओजस्वी वक्ता, दूरदर्शी कवि और युवा संरक्षक थे । स्वामी जी के दिखाए रास्ते पर चलकर ही हम आत्म निर्भर, श्रेष्ठ भारत और भारत को विश्व गुरु बनाने का सपना साकार कर सकते हैं। आजादी के अमृत काल में एक महान दार्शनिक, विचारक और युवा दिल प्रेरणापुंज स्वामी विवेकानंद के विचार आदर्श सिद्धांत, आध्यात्मिक सामाजिक परिकल्पना को आत्मसात करने का संकल्प लेकर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करें।
छन्नूलाल साहू शिक्षाविद्
प्रधान पाठक शास. प्राथ शाला कुम्हली
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Ghanshyam Prasad Sahu
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