बात उन दिनों की है, जब मेरी शादी को मुश्किल से दस दिन ही हुए थे। वर्ष था 2017। विवाह की रस्मों की मिठास अभी तक मन में बसी ही थी कि मेरी शादी की यात्रा “पोस्टिंग यात्रा” शुरू हुई – गंतव्य था कोंटा, छत्तीसगढ़ के सबसे संवेदनशील और नक्सल-प्रभावित इलाकों में से एक।
वैसे तो मेरे पति श्री एमन साहू जी की पोस्टिंग कोंटा में 2012 से ही थी, लेकिन मेरी पहली यात्रा उस स्थान तक शादी के बाद हुई थी। उस समय मेरे पति श्री एमन साहू टी.आई. कोंटा के रूप में कार्य कर रहे थे! शादी के लिए उन्हें मात्र 10 दिन की छुट्टी ही मिली थी इसलिए हमें तुरंत ज्वाइन करने जाना था!
रायपुर से निकलकर हम सबसे पहले जगदलपुर पहुँचे। वहाँ एक रात ठहरकर अगली सुबह कोंटा की ओर रवाना हुए। कोटा छत्तीसगढ़ का सबसे लास्ट बॉर्डर है और वहां से दूसरा राज्य तेलंगाना शुरू हो जाता है सुकमा जिले का सबसे लास्ट और संवेदनशील थाना... रास्ता जैसे खत्म हो गया था–उस समय कोई पक्की सड़क नहीं, जंगल, डर और सन्नाटा हमारे साथ था। जब हम सुकमा से आगे बढ़े, तो उस समय पुलिस पेट्रोलिंग की व्यवस्था के साथ आगे बढ़ना होता था, मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि मैं कहाँ जा रही हूँ। परंतु पति का साथ और भीतर का विश्वास मेरे संबल बने।
कोंटा पहुँचे तो वो दृश्य आज भी आंखों के सामने ताज़ा है–वहाँ के समस्त पुलिसकर्मियों ने वहां के लोगों ने मुझे बिल्कुल एक नववधू, एक बहू की तरह स्वागत किया। कई घरों में मुझे लंच-डिनर के लिए बुलाया गया, महिलाएं मुझे साड़ी उपहार में दे रही थीं। अनजाना जंगल, लेकिन अपनों जैसा अपनापन।
कोटा में पुलिस जवान एक कैंप में रहते थे और हमारा क्वार्टर भी इस कैंप के अंदर ही था रात और दिन पुलिस के जवान पहरा देते रहते थे थाना और हमारा क्वार्टर बिल्कुल लगा हुआ था जब मैं घर के अंदर पहुंची तो मैंने देखा कि मेरे हस्बैंड एक-47 को जिस तरह हम घर में किसी लाठी को रखते हैं इस तरह फुल लोडेड एक-47 रेडी रखा रहता था! मेरे लिए यह सब कुछ नया था सभी जवान हर समय हथियार के साथ लेस रहते थे!
कोंटा पहुँचे मुश्किल से पांच दिन ही हुए थे। एक शाम मैं और मेरे पति ज़मीन पर बैठकर खाना खा रहे थे। खाना शुरू ही किये थे । तभी एक जवान दौड़ते हुए आया – “सर! कोटा से एक किलोमीटर दूर एक स्कॉर्पियो और बस को नक्सलियों ने जला दिया है।” और यात्रियों को रास्ते में ही उतार दिए थे..
एमन जी सूचना पाकर तुरंत उठ खड़े हुए। चप्पल और घर के साधारण कपड़ों में थे, लेकिन बिना एक पल गंवाए उन्होंने हमारे घर के दरवाज़े के पास रखी AK-47 उठाई–जैसे किसी घर में लाठी उठाई जाती है–और जवानों के साथ निकल पड़े एंटी लैंड वाहन में...
उस रात जंगल की खामोशी गोलियों की आवाज़ों से गूंज उठी। मेरे दिल की हर धड़कन मानो ठहर गई थी। मैं छत पर खड़ी प्रार्थना कर रही थी–आँखें आसमान की ओर, और कान उस दिशा में जहां मेरे पति अपने कर्तव्य की आग में तप रहे थे।
रात के तीन चार बजे वह लोग नक्सलियों से लड़कर और उन्हें जंगलों में वापस भागकर वापस आए तब तक मैं जाग रही थी और मेरे आंसू रुक नहीं रहे थे... ऐसी कई लड़ाइयां है और कई कहानियां है वहां पर हर एक जवान हर एक पत्नी की हर दिन की लड़ाई की कहानी है......
यह बताते हुए मैं बहुत भावुक हो रही हूं कि इस जगह कोंटा में (same place konta) यह घटना हुई जिसमें हमारे दोस्त आकाश जी शहीद हो गए...
इसी कोंटा की धरती पर, वही जगह दिनांक 09.06.25 को आकाश राव, मेरा सहपाठी, एक जांबाज़ अधिकारी शहीद हो गए, हम दोनों ने पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन साथ पढ़ा था, दिल्ली से लौटे थे, और बस्तर की धरती पर अपना बलिदान दे दिए!
2017 में मैं रेल सुरक्षा बल पोस्ट दुर्ग में सब इंस्पेक्टर के रूप में पदस्थ थी, लेकिन उस समय मैं सिर्फ एक पुलिस पत्नी बनकर अपने पति के साथ कोंटा गई थी। और यकीन मानिए, यह रोल भी एक युद्धभूमि जैसा है। वहाँ हर पटाखे की आवाज़ दिल दहलाती थी, रात की नींद अधूरी रहती थी, हर झाड़ी, हर सन्नाटा कोई अनहोनी लिए खड़ा होता था। कोंटा में बना वह छोटा-सा थाना कैंप– जहाँ मैं बहू बनकर पहुँची थी– उसने मुझे भीतर से एक सिपाही बना दिया।
"शादी का सिंदूर लिए, AK-47 की परछाईं में बैठी एक औरत... यही है एक पुलिस पत्नी की पहचान।”
यह कहानी उन तमाम बहादुर पत्नियों को समर्पित है जो अपने पति की वर्दी के पीछे एक अदृश्य ढाल बनकर खड़ी रहती हैं—मजबूती से, मौन में, लेकिन पूरे विश्वास के साथ।
श्रद्धांजलि आकाश राव जी एडिशनल एसपी कोंटा (मेरे दोस्त, मेरे भाई, मेरे कोचिंग के बैचमेट आपको शत शत नमन मेरा प्रणाम!
-- इंस्पेक्टर तरुणा साहू RPF रेल सुरक्षा बल थाना प्रभारी राजनांदगांव छग
Ghanshyam Prasad Sahu
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