आपातकाल (Emergency) भारतीय संविधान में वर्णित एक विशेष स्थिति है, जब देश की सुरक्षा, व्यवस्था या शासन -व्यवस्था गंभीर संकट में होती है और सामान्य संवैधानिक अधिकारों को सीमित या स्थगित किया जा सकता है! भारत में अब तक तीन बार राष्ट्रीय आपातकाल लगाया गया है–1962, 1971 और 1975 में। इनमें सबसे चर्चित और विवादास्पद था 1975 का आपातकाल, जिसे "काले अध्याय" के रूप में याद किया जाता है!
सन 1975-77 का आपात काल, जिसने भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी! 25 जून 1975 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सिफारिश पर तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने संविधान के अनुच्छेद 352 के अंतर्गत “देश में आंतरिक अस्थिरता” का हवाला देकर आपात काल लागू किया। इसके तहत निम्नलिखित प्रभाव पड़े:
1. मौलिक अधिकार निलंबित: नागरिकों के मौलिक अधिकार (जैसे–अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, प्रदर्शन, सभा आदि) समाप्त कर दिए गए। प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई।
2. राजनीतिक दमन: लाखों लोगों को बिना मुकदमे जेल में डाल दिया गया। विपक्षी नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को गिरफ्तार कर लिया गया। इनमें जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मोरारजी देसाई जैसे नेता शामिल थे।
3. मीसा और डीआईआर: MISA (Maintenance of Internal Security Act) और DIR (Defence of India Rules) जैसे कड़े कानूनों का प्रयोग कर नागरिकों को बगैर कारण बंदी बना लिया गया।
4. सत्ता का केंद्रीकरण: संपूर्ण सत्ता प्रधानमंत्री और उनके कुछ विश्वस्तों के हाथों में केंद्रित हो गई।चुनाव टाल दिए गए और संविधान में कई संशोधन किए गए।
5. ज़बरदस्ती और अत्याचार: नसबंदी अभियान, झुग्गी-झोपड़ी हटाओ आंदोलन में व्यापक ज़्यादती हुई।गरीबों और अल्पसंख्यकों को विशेष रूप से निशाना बनाया गया।
आपातकाल का अंत: 21 मार्च 1977 को जन आंदोलन, विरोध और अंतर्राष्ट्रीय आलोचना के कारण आपात काल को समाप्त किया गया!
जनता पार्टी को मिली सत्ता : आपातकाल हटाने के बाद चुनाव हुए और जनता पार्टी सत्ता में आई। यह पहला मौका था जब कांग्रेस हार गई और लोकतंत्र ने जीत दर्ज की!
महत्वपूर्ण सीख: "लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, बल्कि नागरिक अधिकारों, स्वतंत्र मीडिया और स्वतंत्र न्यायपालिका से सुरक्षित रहता है।"
आपातकाल भारतीय इतिहास की वह चेतावनी है, जो हमें याद दिलाती है कि संविधान की रक्षा करना हर नागरिक का कर्तव्य है। सत्ता जब बेकाबू हो जाए, तो जनचेतना ही उसका संतुलन है!
लोकतंत्र के प्रहरी: स्व. जीवनलाल साव (एडवोकेट महासमुंद छग)
छत्तीसगढ़ का साहू समाज न केवल सामाजिक और आर्थिक जागरूकता में बल्कि स्वतंत्रता संग्राम और लोकतंत्र की रक्षा के संघर्ष में भी अग्रणी रहा है। विशेषकर मीसाबंदी आंदोलन में साहू समाज के योगदान को इतिहास में वह स्थान नहीं मिल पाया, जिसके वे पात्र थे।स्व. जीवनलाल साव जी छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मध्यप्रदेश क्षेत्र के प्रथम मीसाबंदी के रूप में इतिहास में दर्ज हैं। उन्होंने आपातकाल (1975-77) के समय निडरता और वैचारिक स्पष्टता के साथ लोकतंत्र की रक्षा हेतु आवाज़ उठाई और Maintenance of Internal Security Act (MISA) के अंतर्गत बिना अपराध के जेल में डाले गए।
उनके व्यक्तित्व की विशेषताएं:
साहसिक नेतृत्व: उन्होंने शासन के दमन के सामने झुकने के बजाय लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों की रक्षा को प्राथमिकता दी।
कानूनी विद्वत्ता: एक एडवोकेट होते हुए उन्होंने संविधान, नागरिक अधिकारों और न्यायिक मूल्यों को जनता तक पहुंचाया।
सामाजिक चेतना: देश के प्रथम आदर्श विवाह समारोह के प्रणेता अधिवक्ता स्व जीवन लाल साव ने साहू समाज के युवाओं को सिर्फ व्यवसाय नहीं, बल्कि विचार और अधिकार के लिए जागरूक किया।
साहू समाज का स्वतंत्रता और लोकतंत्र में योगदान
छत्तीसगढ़ के साहू समाज ने सदैव संघर्षशीलता, समर्पण और सेवा की मिसाल कायम की है। कई स्थानों पर साहू समाज के लोगों ने दांडी यात्रा, भारत छोड़ो आंदोलन और जमींदारी उन्मूलन आंदोलनों में भाग लिया। स्वतंत्रता पश्चात आपातकाल में मीसाबंदियों में शामिल होकर उन्होंने लोकतंत्र की मूल आत्मा की रक्षा की।
वर्तमान पीढ़ी के लिए संदेश
"यदि आज हम आज़ाद हवा में सांस ले रहे हैं, तो वह उन अनाम और अल्प-ज्ञात सेनानियों की बदौलत है, जिन्होंने अपना सर्वस्व देकर लोकतंत्र की लौ को बुझने नहीं दिया।"
स्व. जीवनलाल साव जी जैसे महापुरुषों के कार्यों को यदि हम स्मरण नहीं करते, तो यह हमारे इतिहास और उत्तरदायित्व दोनों के साथ अन्याय है। इसलिए आवश्यक है कि उनके नाम पर स्मृति व्याख्यान, वार्षिक पुरस्कार या विधिक साक्षरता शिविर आयोजित किए जाएं। साथ ही स्कूलों में उनके जीवन और संघर्ष को पाठ्यक्रम में जोड़ा जाए!
Ghanshyam Prasad Sahu
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