कुछ लोग किसी कार्यक्रम में शामिल होकर, कोई अतिथि बनकर, एक ही माला को अतिथि को बार बार पहनाकर, कोई श्रोता और दर्शक बनकर, कोई मुख्य अतिथि को गुलदस्ता या गिफ्ट देकर, कुछ लोग फ़ोटो सेशन में शामिल होकर, कुछ लोग साथ बैठकर खाना खाकर सामाजिक होने का भ्रम पाले रहते हैं!
भीड़ का हिस्सा होना भी अच्छा है। भीड़ में व्यक्ति निर्भय हो जाता है। दीगर लोगों को आपकी भीड़ से यह भ्रम पैदा हो जाता है कि आप खास लोग हैं, ताकतवर हैं और उनके लिए बड़े उपयोगी हैं, वोटबैंक तो हैं ही। कभी कभी किसी अतिथि को माला और गुलदस्ता भेंट करना बड़ा फ़ायदे का होता है, इससे मुख्य/ विशिष्ट अतिथि को ध्यान रहता है कि आप कोई विशेष व्यक्ति हैं। साथ साथ रहना, खाना, नाचना गाना, भाषण करना, चौक चौराहों पर अपना पोस्टर लगाना; इसका लाभ यह है कि लोग पोस्टरबाज को दूर से पहचान लेते हैं। पहचान होने से बड़े बड़े व्यक्तिगत काम आसानी से हो जाते हैं। अखबार में नाम और फोटो छपवाना तथा जयंती उत्सव की शुभकामना प्रकाशित करवाना भी सामाजिक कार्य है, लेकिन है बहुत तुच्छ स्तर का। जिन लोगों को इतने में सुख और संतोष मिलता है, वे भी धनभागी हैं। इतना करने वाले भी आजकल कहां मिलते हैं? लोगों को जय जयकार करने के लिए, झंडा लहराने के लिए मजदूरी, खाना देकर बुलाना पड़ता है। गाड़ी में बिठाकर लाना और घर तक सकुशल पहुंचना भी पड़ता है। कभी कभी तो मंच पर अतिथि इतने अधिक हो जाते हैं कि उनको माला पहनाने वाले भी कम पड़ जाते हैं। बेचारे वरिष्ठ पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को बेमन से बार बार मंच पर जाना पड़ता है! सामाजिक होने का बड़ा संताप है!
लेकिन हम सब इतने से सच्चे सामाजिक नहीं बन सकते!
ऐसा व्यक्ति जिसके भीतर अपने लोगों के प्रति आत्मीयता, उदारता, मेल मिलाप और क्षमाशीलता का भाव हो! वही सच्चा मानव है। ऐसा मानव ही सच्चा सामाजिक भी होता है। सामाजिक होना याने काम का व्यक्ति होना! आप किसी स्वजन/ कुटुंबी और ईष्ट मित्र के लिए उपयोगी बनते हैं, उसकी सेवा सहायता करते हैं, उसको ऊंचा उठाने और आगे बढ़ाने में योगदान करते हैं, उसकी पीड़ा को कम करने में सहयोगी बनते हैं, तो आप सच्चे अर्थों में सामाजिक व्यक्ति हैं। जब कभी कोई अपना स्वजन परिजन मिले, उसको अपना प्यार और सम्मान दें! उसकी समस्याओं को सुनें। उसको सांत्वना दें। उसके पीड़ा निवारण का उपाय करें, तो आप अच्छे और सच्चे सामाजिक व्यक्ति हैं!
अगर आप शिक्षा के विस्तार में, स्वास्थ्य की सुरक्षा में, किसी को नौकरी दिलाने अथवा व्यवसाय शुरू करने में, किसी की शादी ब्याह का संबंध लगवाने में, सामाजिक सम्मान, सुरक्षा और न्याय दिलाने में योगदान करते हैं, तो आप बहुत बड़े सामाजिक संत हैं! अगर आप जल, वायु, पेड़, पौधे, पशु पक्षी आदि की सुरक्षा हेतु, पर्यावरण संरक्षण हेतु कार्य करते हैं, तो आप भुसुर हैं, धरती के देवता हैं। इसके लिए आपको किसी वर्ग विशेष में जन्म लेना आवश्यक नहीं! आप इस देश और दुनिया के लोगों को उन्नत, विकसित, श्रेष्ठ और महान बनाने की साधना करते हैं और धरती को ही स्वर्गोपम बनाने का प्रयत्न करते हैं, तो आप इस युग के अवतार अथवा भगवान हैं! भगवान बना जा सकता है। इस धरती पर बहुत से लोग अपने दिव्य कर्मों से भगवान बन चुके हैं!
कुल मिलाकर सामाजिक होने का बस इतना ही मतलब है। बाकी सामाजिक कार्यकर्ता होने का मतलब और फ़ायदा तो आप जानते ही हैं! ..तो प्रयास जारी रखिए! एक दिन आप भी देवता और भगवान अवश्य बन जायेंगे!
कुछ विशिष्ट परजीवी लोग जो खुद को महान समाजसेवी कहते हैं, माला भी पहनते हैं और मालामाल भी बनते हैं, बिना कुछ किए, पैसा देकर पद खरीदते हैं, रिश्वत देकर चुनाव जीतते हैं और किसी पार्टी विशेष का प्रचार करते हैं, उनको बारंबार नमस्कार है!
यह संदेश उनके लिए जरा भी उपयोगी नहीं है!
पं. घनश्याम प्रसाद साहू
संपादक छत्तीसगढ़ संदेश
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Ghanshyam Prasad Sahu
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