July 23, 2026   gpsahu



हम कितने शिक्षित हैं यह हमारी डिग्री तय नहीं करती, अपितु हमारे कार्य एवं व्यवहार से झलकती है

शिक्षा वही जो हमें विनम्र, संवेदनशील, ईमानदार और मानवीयता से परिपूर्ण बना दे

आज के समय में बहुत से लोगों के पास ऊँची-ऊँची डिग्रियाँ हैं, लेकिन यदि उनके व्यवहार में विनम्रता, संवेदनशीलता और मानवता नहीं है, तो उनकी शिक्षा अधूरी मानी जाएगी। दूसरी ओर, कई ऐसे लोग भी हैं जो अधिक पढ़े-लिखे नहीं हैं, फिर भी उनका व्यवहार इतना मधुर और आदर्श होता है कि वे सभी के सम्मान के पात्र बन जाते हैं।

शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान अर्जित करना नहीं है, बल्कि अच्छे संस्कार, विवेक और चरित्र का निर्माण करना भी है!

 यदि कोई व्यक्ति अपने माता -पिता का सम्मान करता है, बुजुर्गों का आदर करता है, छोटे लोगों से प्रेमपूर्वक बात करता है, जरूरतमंद की सहायता करता है और दूसरों की भावनाओं का सम्मान करता है, तो वही वास्तव में शिक्षित कहलाने योग्य है।


व्यवहार ही वह दर्पण है जिसमें व्यक्ति का चरित्र दिखाई देता है। क्रोध, अहंकार, कटु वचन और दूसरों का अपमान यह बताते हैं कि व्यक्ति ने केवल किताबें पढ़ी हैं, जीवन नहीं सीखा। वहीं धैर्य, विनम्रता, सहनशीलता, ईमानदारी और करुणा यह सिद्ध करते हैं कि शिक्षा उसके जीवन में उतर चुकी है।

इतिहास भी इसका साक्षी है। अनेक महापुरुषों ने केवल ज्ञान नहीं दिया, बल्कि अपने व्यवहार से समाज को प्रेरित किया। उन्होंने सिखाया कि मनुष्य की महानता उसके रूप, पद, धन या डिग्री से नहीं, बल्कि उसके आचरण से आँकी जाती है।

सच कहें तो—

डिग्री हमें नौकरी दिला सकती है, लेकिन अच्छा व्यवहार हमें लोगों के दिलों में स्थान दिलाता है। सच्ची शिक्षा वही है जो मनुष्य को विनम्र, संवेदनशील, ईमानदार और मानवता से परिपूर्ण बना दे!

सूबेदार धर्मगुरु 

पं घनश्याम प्रसाद साहू 

रायपुर छग 8269970135

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