श्रीराम के सच्चे भक्त हैं, तो अपने भीतर के काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार रूपी रावण को मारें! सारी धरती को रावण के वंशजों ने घेर रखा है; कोई गरीबों और अनपढ़ लोगों से अंगूठा लगवाकर, तो कोई राजनीतिक पद और प्रभाव से निजी या सरकारी जमीन हथिया लिए हैं !
दशहरा पर लोग रामलीला देखने जा रहे हैं। राम रावण के युद्ध को मंच पर दिखलाया जाएगा। रामजी रावण को मार डालेंगे और लीला समाप्त हो जाएगी। लेकिन एक बड़ा सवाल खड़ा है, जो कि हर बार की तरह इस बार भी खड़ा ही रह जाएगा। सवाल यह है कि हर वर्ष रावण का पुतला बड़ा होते जा रहा है! उसके साथ सजावटी सामानों की भी बढ़ोतरी हो रही है। ऐसा लगता है कि विद्वान और कलाकार लोग रावण से ज्यादा प्रभावित हैं। रावण को सजाने और बड़ा करने में विद्वानों का बड़ा हाथ है। अधिकांश शहरों में दशहरा मैदान में रावण की पत्थर की मूर्तियां भी बनी हुई हैं। लगता है, यह संसार रावण को जिन्दा बनाए रखना चाहता है! बेशक राम को पूजता रहे, किन्तु रावण को भुला पाना असम्भव सा है!
.. तो आज घर घर रावण की चर्चा है। आज लोग रावण को मारने जाएंगे, उसका पुतला जलाएंगे। बच्चे बूढ़े सभी रावण को देखने लालायित हैं। रावण के 10 सिर हैं और 20 भुजाएं हैं, यद्यपि पुतले में लोग 20 हाथ बनाने की झंझट नहीं पालते, दो ही हाथ से संतुष्ट हो जाते हैं। लेकिन रावण को कोई फ़र्क नहीं पड़ता, चाहे आप उसके कितने हाथ बना लो। हाथ न भी बनाओ तो भी चलेगा। आखिर जलाना तो है ही...! रावण की एक मुंडी गधे जैसा है। गधा तो था ही वह.. हां आजकल रावण के वंशज भी उठ खड़े हुए हैं, वे कुछ सालों से रावण दहन का विरोध भी कर रहे हैं। कहीं कहीं पुलिस कचहरी की भी नौबत आ गई है। सुना है, दो तीन साल पहले एक ब्राह्मण संगठन वाले भी रावण को ब्राह्मण कहकर पुतला दहन का विरोध जता रहे थे। लेकिन रावण निश्चिंत हैं। रावण जी महाराज अच्छी तरह से जानते हैं कि ये दोनों ही उनके हितैषी नहीं हैं। ये राजनीति है। राजनीति में ऐसा ही होता है! नेता और अभिनेता को सब कुछ माफ़ है। वे लोग समय अनुसार कभी राम तो कभी रावण बन जाते हैं, बन सकते हैं। उदाहरण के लिए, दारू को जनता बनाए, पिए और बेचे तो अपराध; सरकार बनाए और बेचे तो पुण्य! तो भईया रावण सबके दिलों में छाए हुए हैं, उनको एकाएक नहीं निकाल सकते। सभी ग्रंथों में उनकी कहानी है, उनकी चर्चा है। सभी बड़े शहरों में उनके नाम पर स्थान सुरक्षित हैं, खाली मैदान है। जनता के लिए घर बनाने के लिए और बच्चों के लिए खेल का मैदान तक नहीं बचा है, मवेशी को चराने के लिए घास जमीन नहीं है, लेकिन रावण का मैदान खाली पड़ा है। ऐसी है रावण की महिमा! सारी धरती को रावण के वंशजों ने घेर रखा है! कोई गरीबों की मजबूरी का फ़ायदा उठाकर सस्ते में खरीद लिए, कोई उनको डराकर अंगूठा लगवा लिए, कोई उनको मारपीट कर उनकी जमीन छीन लिए, तो कोई राजनीतिक पद और प्रभाव से निजी या सरकारी जमीन को कब्ज़ा कर लिए! अब आप यह मत समझ लीजिए कि आपके पास बहुत सी जमीन और मकान है, सोना चांदी है, तो आप भी रावण के वंशज ही होंगे!
रामचरित मानस में पढ़ी है.. वह इंद्रादि देवताओं को मार कूटकर अपना नौकर चाकर बना लेता है। इंद्रदेव से हाथ पैर दबवाता है। पवनदेव से पंखा झलवाता है, वरुणदेव से पानी भरवाता है! पता चला कि कुबेर ने सोने की लंका बना डाली है, तब वह ईर्ष्या से जल भुन गया। था तो उसका बड़ा भाई, लेकिन उसको पसंद नहीं आई कि उसका भाई अमीर रहे.. उससे लंका छीन ली। जिसके पास भी कुछ अच्छी चीज देखा, सबको छीन लिया। किसी को बल से तो किसी को छल से.. उसने श्रीराम जी की धर्मपत्नी सीताजी का अपहरण कर लिया और श्रीराम जी को युद्ध की चुनौती दे डाली। बाकी क्या हुआ, सारी दुनिया जानती है। वैज्ञानिक कहते हैं कि सोना आग में जलता नहीं, लेकिन रावण की लंका जल गई, तो नकली सोना रहा होगा, किसे पता? इस प्रकार रावण की कथा है!
अब हम खुद के बारे में सोचें! अगर हम भी रावण जैसा सोचते और करते हैं, तो हम भी रावण हैं। हमारा आकार रावण से बेशक छोटा है, मगर हम रावण ही हैं! श्रीराम की पूजा करने भर से कोई भक्त नहीं बन सकता। उसे श्रीराम के आदर्श को अपनाना पड़ेगा! इसी प्रकार रावण को गाली देने या उसका पुतला दहन करने से कोई धर्मात्मा नहीं बन जाता, अपितु रावण की प्रवृत्ति से मुक्त होना पड़ेगा!
लोग राम की जय जयकार भी करते रहते हैं और रावण बने भी रहते हैं। चंदन त्रिपुंड भी लगाते हैं और तम्बाकू गुटखा भी दबाए रखते हैं, दारू भी पीते हैं। पराई स्त्री पर नज़र भी गड़ाए रहते हैं और दुर्गा जी की आरती भी उतारते रहते हैं। आज का आदमी रावण का बाप है! मैं भी रावण हूं! आप भी रावण हैं!
आपको रावण कहा, तो आप बुरा मान गए न? आप बुरा मान सकते हैं। मैं नहीं मानता। महाराज रावण शिवजी के परम भक्त थे और कुबेर जी के भाई थे, इस लिहाज़ से वे हमारे पूर्वज ही हुए! अब आप रावण से अपनी दूरी बनाए रखें या दोस्ती कर लें, आपकी अपनी इच्छा!
रावण को कौन अपना मानता है या पराया, रावण को कोई अंतर नहीं पड़ेगा! जब तक इस देश धूर्त लोग रहेंगे, तब तक इस धरती पर रावण जिन्दा रहेंगे! राम सही थे कि रावण? इस झंझट में पड़कर संगठन वालों और उनके रिश्तेदारों से मार थोड़े ही खाना है! अपना काम है मेला जाना और मिठाई का आनंद लेना है!
समझदार लोगों! कितना भी पुतले जला लो, रावण को मार नहीं पाओगे, जब तक भीतर में असत के प्रति आकर्षण है, माला पहनने या पहनाने का शौक और इरादा है, फ़ोटो शूट करने का मन है, माइक पकड़े रहने की बीमारी है, कुर्सी और मंच पर बैठे रहने का मन है, मान सम्मान की भूख है, स्त्रियों को नचवाने का शौक है, रावण कभी नहीं मरेंगे। रावण किसी न किसी रूप में हमारे भीतर बने रहेंगे! जब तक अपने भीतर सर्वज्ञ और सर्वश्रेष्ठ होने का अहंकार पाले हुए हैं, अनियंत्रित आवेश और क्रोध से भरे हुए हैं, छल छद्म, वासना का विकार, लोभ लिप्सा, ईर्ष्या द्वेष और दूसरों का समूल नाश कर ब्रह्मांड में अपना एकाधिकार करने की इच्छा रखे हुए हैं; पराई स्त्री और पराए धन को छीनने/ पाने का विचार करते हैं। तब तक हम रावण ही बने हुए हैं! इसलिए जरूरी है कि हम सबसे पहले अपने भीतर के रावण को मारें!
श्रीराम को मानें न मानें, उनकी पूजा करें न करें, किन्तु रावण को अवश्य मारें! पूजा नहीं करेंगे, तो भगवान जी नाराज नहीं होंगे, लेकिन रावण बनकर श्रीराम की टोली में रहेंगे, तो रामजी को बुरा लगेगा!
पं. घनश्याम प्रसाद साहू रायपुर छत्तीसगढ़ सम्पर्क नं. 8269970135
Ghanshyam Prasad Sahu
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